Sunday, December 12, 2010

Muslim Society & New Year मुस्लिम समाज और नववर्ष Sharif Khan

किसी भी मशहूर घटना की याद क़ायम रखने के लिए आवश्यक है कि उस घटना को घटित हुए जितना समय गुज़रा हो उसकी गणना होती रहे। इसको यादगार बनाने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि उस समय से सन् प्रारम्भ कर दिया जाए। यह बात अधिकतर धर्म व संस्कृतियों में देखी जा सकती है जैसे विक्रमी संवत्, ईसवी सन्, हिजरी सन् आदि। इनमें हिजरी सन् के अलावा जितने भी सन् शुरू हुए हैं वह प्रथम माह से शुरू हुए हैं परन्तु हिजरी सन् प्रथम माह से शुरू न होकर तीसरे माह से प्रारम्भ होता है। यह सन् पैग़म्बर हज़रत मौहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मक्का से मदीना हिजरत करने के समय से शुरू होता है और पैग़म्बर सल्ल० ने तीसरे माह (रबीउल अव्वल) की पहली तारीख़ को मक्का छोड़ा था तथा 8 तारीख़ को मदीने से कुछ किलोमीटर पहले क़ुबा के मुक़ाम पर पहुंचे तथा इसके बाद 12 तारीख़ को मदीना में प्रवेश किया था। इस प्रकार से यदि मक्का छोड़ने के समय को हिजरत मानी जाए तो रबीउल अव्वल की पहली तारीख़ तथा यदि मदीने में प्रवेश करने के समय को हिजरत मानी जाए तो रबीउल अव्वल की 12 तारीख़ से हिजरी सन की शुरूआत होती है। जिस प्रकार से यात्रा आरम्भ करने के साथ ही कोई व्यक्ति यात्री कहलाने लगता है उसी तरह हिजरत के लिए घर छोड़ने के समय को हिजरत करना कहते हैं अतः रबीउल अव्वल की पहली तारीख़ से हिजरी सन् का आरम्भ हुआ।
इस बात की जानकारी होना भी आवश्यक है कि अरब में समय की गणना सूर्य से न होकर चन्द्रमा से होती रही है और प्राचीन काल से समय की गणना के लिए जो पद्धति अपनाई हुई थी उस में किसी भी प्रकार का रद्दो बदल न करके उसी को अपना लिया गया यहां तक कि महीनों के नाम भी वही क़ायम रहे जो पहले से चले आ रहे थे जोकि इस प्रकार हैं - (1) मुहर्रम (2) सफ़र (3) रबीउल अव्वल (4) रबीउस्सानी (5) जमादिउल अव्वल (6) जमादिउस्सानी (7) रजब (8) शाबान (9) रमज़ान (10) शव्वाल (11) ज़ीक़ाद (12) ज़िलहिज्ज।
इस प्रकार से हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम का बेशक है परन्तु हिजरत की घटना चूंकि तीसरे माह की पहली तारीख़ को घटित़ हुई थी इसलिये नया साल मुहर्रम के महीने से आरम्भ होने का कोई औचित्य ही नहीं है। जनवरी की पहली तारीख़ को नववर्ष के तौर पर मनाने का चलन है और 31 दिसम्बर व 1 जनवरी के बीच की मध्यरात्रि को समारोह आयोजित किये जाते हैं।
साम्प्रदायिकता वादी ईस्वी सन् को ईसाई धर्म से जोड़ कर इस दिन को नववर्ष के रूप में मान्यता देने से बचते हैं और सम्वत् के अनुसार हिन्दी नववर्ष के रूप में चैत्र मास की पहली तारीख़ को मान्यता देने का संकल्प लिये हुए हैं परन्तु सफल नहीं हो पा रहे। मुस्लिम समाज यदि मुहर्रम के महीने से वर्ष की शुरुआत माने तो इस माह के पहले दस दिन मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे ज़्यादा शर्मनाक और मानवता को कलंकित करने वाले जु़ल्म की कहानी कह रहे होते हैं अतः इसको समारोह का रूप नहीं दिया जा सकता। रबीउल अव्वल माह की पहली तारीख़ हिजरत वाला दिन है इसको ऐतिहासिक तथ्य के रूप में मान्यता तो दी जा सकती है परन्तु समारोह के तौर पर मनाया जाना इसलिए अनुचित है क्योंकि शरीअत में किसी भी घटना की वर्षगांठ मनाया जाना साबित नहीं हैं। अतः मुसलमानों को चाहिए कि नया साल, किसी का जन्म दिन, बरसी आदि हर प्रकार के आयोजनों से स्वंय दूर रखें। आवश्यकता इस बात की है कि इस्लाम धर्म के आलिम हज़रात इन तथ्यों की रोशनी में दिशा निर्देश दें ताकि मुस्लिम समाज भटकने से बचा रहे।

5 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

nice post.

DR. ANWER JAMAL said...

आपकी अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा ।

Dr. Ayaz Ahmad said...

अच्छी जानकारी

Dr. Ayaz Ahmad said...

शरीफ साहब आप काफी दिन बाद नज़र आए ? सब ठीक ठाक तो है न ? अल्लाह आपको अच्छी सेहत दे ।

Muhammad Ali said...

assalamualikum, bahut hi acchi post hai masha allah, aappne fir se ek baar sochne layak baat ki oor aakarshit kiya hai, hum aapke aabhari hain,aaeendaa bhi likhte rahe , allah aapko himmat sehat aur ikhlass me istaqamat ata farmaaye.

aapne jo line last me likhi hain, unki pushti hote huee me yahan saudi arab me dekh raha hun, yahan ab muharram ki 10 tareekh shuru ho gaye hai lekin yahan muharram ki wajah se koi chhutti nahi hai koi kisi tarah ki celebration nahi hai.ye chunki weeked hai isliye aaj academic institutions band hain inme muharram ka koi dakhal nahi hai.

apne blog ke madhyam se jo request aapne ulema hazraat se kee hai, ki wo logon ka sahi margdarshan karen aur ummete muslima ko sahi rah dikhayeen wo kaafi touch karne wali hai masha allah achchi hai,saath me allah se ye bhi duaa karen ki allah tala awamunnas (HUm Logon ) ko itni aqal zaroor de ki hum apni islah ki fiqr karke ulema ke taraf apna rukh karen , aur sari zimmedari sirf ulema ke sar par hi na rakhen.
after all, ek achchi koshish, jazakallah.