Sunday, April 23, 2017

गाय जैसे बेज़बान जानवर को भूख से तड़पा कर मारने वालों को तो फांसी दे दो। Sharif Khan

अल्लाह ने इंसान के खाने के लिये बहुत सी नेअमतें पैदा की हैं जिनमें गाय, भैंस, बकरी आदि जानवर भी हैं। जानवरों को खाने के लिये जब काटा जाता है तो उसके लिये भी कुछ नियम हैं जैसे उसको भूखा प्यासा न रखो तथा तेज़ छुरी से इस प्रकार काटो कि उसको कम से कम कष्ट हो क्योंकि उसको सज़ा देने के लिये नहीं काटा जाता है बल्कि उससे भोजन प्राप्त करना मक़सद होता है।
भारत में गौरक्षकों के रूप में कुछ लोगों का दल वजूद में आया है जो गौलुटेरे हैं। चूँकि यह गौलुटेरे भाजपा द्वारा वजूद में लाए गए हैं लिहाज़ा जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकार है और गाय काटने को क़ानून द्वारा प्रतिबन्धित किया हुआ है वहां गाय के द्वारा मुसलमानों को प्रताड़ित करके साम्प्रदायिकतवादी हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करना भी इनकी ज़िम्मेदारी में आता है। 
राजस्थान के गृहमन्त्री गुलाब चन्द कटारिया ने बयान दिया है कि यदि गो तस्करी की सूचना या आशंका होती है तो गोरक्षक वाहनों को रोक सकते हैं लेकिन उन्हें किसी के साथ मारपीट नहीं करनी चाहिए। इन गौलुटेरों के सरकारी संरक्षण में परवरिश पाने के सबूत के लिये एक मन्त्री द्वारा अपने गिरोह के कार्यकर्ताओं को दिए जाने वाले निर्देश के रूप में यह बयान ही काफ़ी है।
यह लुटेरे मुसलमानों की गायों को लूट कर ले जाते हैं और किसी गौशाला में उनको दाख़िल करा देते हैं। गौशाला में गायों के चारे के नाम से प्राप्त होने वाला धन सब लोग मिलबांट कर खा जाते हैं और मौक़ा मिलने पर कुछ गायों को भी क़साई के हाथों बेच कर अपनी जेब गरम कर लेते हैं।
मुसलमानों से छीन कर और आवारा घूमने वाली गायों को पकड़ कर गौशालाओं में दाखिल की गई बेज़बान गायों को भूख से तड़पा कर जिस तरह दर्दनाक मौत मारा जाता है उसको देख कर दिल कांप जाता है।
क्या यह गौ हत्या नहीं है?
सच तो यह है कि केवल यही गौहत्या है क्योंकि काटी जाने वाली गाय के पीछे तो भोजन प्राप्त करना एक मक़सद होता है लेकिन गौशाला में भूख व प्यास से गायों को मारने का क्या औचित्य है?
गुजरात में गाय काटने को अपराध मानते हुए ऐसा करने वालों के लिये मौत की सज़ा तजवीज़ की गई है जबकि भूख प्यास से मारने वालों को कोई भी सज़ा देने का प्रावधान नहीं है। क्या यह इसलिये है कि भूख से मारने वाले सरकारी संरक्षण प्राप्त गौलुटेरे हिन्दू हैं?
ऐसे हालात में देशवासियों को चाहिए कि गाय के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए मुसलमानों पर से गाय खाने पर प्रतिबन्ध हटवाने का आह्वान करें और गौशालाओं में गायों को भूख से तड़पा कर मारने वाले अपराधियों को मौत की सज़ा दिलवाएं चाहे ऐसे अपराधी कोई मन्त्री हों या गोरक्षक दल चलाने वाले हिन्दू नेता हों या कोई भी हों।

Monday, April 17, 2017

गाय मुसलमानों के संरक्षण में ही सुरक्षित रह सकती है। Sharif Khan

पशु प्रेम बुरी बात नहीं है लेकिन अगर कोई शख़्स प्रेम दर्शाने के लिये किसी पशु से अपना रिश्ता क़ायम करते हुए उसको मां बना ले तो उससे उस पशु पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि जन्म देने वाली मां का निरादर अवश्य होता है लेकिन यह चूँकि उनका व्यक्तिगत मामला है लिहाज़ा किसी को इस पर ऐतराज़ करने का हक़ नहीं है। इससे यह अनुमान लगाने में आसानी हो जाती है कि ऐसे लोगों का उस पशु के साथ व्यवहार किस प्रकार का होगा।
मिसाल के तौर पर
जो हिन्दू गाय को मां मानते हैं उन्हीं के यहां वृद्धावस्था में मां बाप को वृद्धाश्रम भेजने की परम्परा है। इसी प्रकार यह गोभक्त गाय से लाभ तो प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन जब वह दूध देना बन्द कर देती है तो उसको क़साई के हाथ बेच देते हैं ताकि वह उसको काट कर उसकी हड्डियां, गोश्त और खाल निकाल कर मुनाफ़ा वसूल कर सके। इनमें से जो लोग किसी कारण से ऐसा नहीं करते तो उनके यहां जिस तरह अशक्त मां बाप को वृद्धाश्रम भेजा जाता है उसी तरह गाय को भूख से तड़प कर अपनी जान देने के लिये गौशाला भेज देते हैं जहां अगर उसके भाग्य में अच्छी मौत लिखी होती है तो गौशाला वाले उसको क़साई के हाथ बेच कर उससे छुट्टी पा लेते हैं वरना वह भूखी प्यासी मर जाती है।
गाय को मां कहने वाले उपरोक्त गोभक्तों और गो रक्षकों के विपरीत यदि कथित गो भक्षकों (मुसलमानों) के गाय के प्रति व्यवहार पर विचार करें तो जो मुसलमान गाय पालते हैं तो वह कभी उसको घर से बाहर लावारिस की तरह नहीं निकालते हैं और उसके चारे का बेहतरीन प्रबन्ध करते हैं यहांतक कि दूध देना बन्द कर देने के बाद भी उसकी उचित देखभाल करते हैं क्योंकि ऐसी स्थिति आने पर उससे अच्छा मांस प्राप्त होता है। इस प्रकार आख़री सांस तक मुसलमान के घर पलने वाली गाय न तो भूखी रहती है और न ही कूढ़े के ढेर में अपनी ख़ुराक तलाश करने के लिये बाहर निकाली जाती है।
पवित्र क़ुरआन की सूरह यासीन की 71, 72 व 73 वीं आयतों में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "क्या यह लोग देखते नहीं हैं कि हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से इनके लिये मवेशी पैदा किये और अब यह उनके मालिक हैं। हमने उन्हें इस तरह इनके बस में कर दिया है कि उनमें से किसी पर यह सवार होते हैं, किसी का यह गोश्त खाते हैं और उनके अन्दर इनके लिये तरह तरह के फ़ायदे और पेय पदार्थ हैं।"
इस प्रकार दूसरे चौपायों के साथ गाय भी चूँकि अल्लाह ने जायज़ बताई है लिहाज़ा क़ुरआन की इस आयत के अनुसार गाय के बछड़ों से बोझ ढोने का काम लेते हैं, गाय का दूध पीते हैं और इस क़ाबिल न रहने पर उसका मांस खाते हैं।
इस प्रकार यदि कथित गो रक्षकों और कथित गो भक्षकों के यहां पलने वाली गायों के साथ होने वाले व्यवहार की तुलना करें तो नतीजे के तौर पर यही हक़ीक़त सामने आती है कि गाय मुसलमानों के संरक्षण में ही सुरक्षित है।

Saturday, April 1, 2017

'तुम्हारा दीन तुम्हारे साथ और मेरा दीन मेरे साथ' वाला नजरिया ही आपसी भाईचारे को मज़बूत बना सकता है। Sharif Khan

मक्का शहर में जब पैग़म्बर स अ व ने लोगों को केवल अल्लाह ही की इबादत करने और अल्लाह के सिवा किसी को भी इबादत के लायक़ न समझने का पैग़ाम दिया तो पूरे इलाक़े में तहलका मच गया और लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उस समय अरब में गुमराह लोगों ने लात, मनात और उज़्ज़ा नामक देवियों के अलावा सैकड़ों ख़ुदा बना रखे थे और उनकी मूर्तियों की पूजा करते थे। पैग़म्बर स अ व की बातों से प्रभावित होकर जो लोग इस्लाम में दाख़िल हो जाते थे उनके विरोध में तमाम इस्लाम विरोधियों के एकजुट हो जाने के बावजूद भी मुसलमानों की तादाद बढ़ती जा रही थी। ऐसी स्थिति में जब उन्होंने इस हक़ीक़त को समझ लिया कि इस्लाम ही सच्चाई का मार्ग है और यह निकट भविष्य में पूरे अरब में फैल जाएगा तो वह मुसलमानों के साथ मारपीट और उनके ख़िलाफ़ विभिन्न प्रकार के दुष्प्रचार तो करते ही थे लेकिन इसके साथ ही पैग़म्बर स अ व से समझौते की बातचीत की भी कोशिश करते रहते थे।
जिस प्रकार जाली नोट चलाने के लिये असली नोटों का सहारा लिया जाता है और असली नोटों में उनको मिलाकर चलाने से जाली नोटों का वजूद ख़त्म होने से बचा रहता है उसी तरह इस्लाम विरोधी लोग पैग़म्बर स अ व के सामने तरह तरह की पेशकश रखते थे। कभी वह कहते थे कि आप हमारे खुदाओं को और देवी देवताओं की पूजा करो तो हम भी आपके अल्लाह की इबादत करेंगे और कभी कहते थे कि कुछ दिन आप हमारे खुदाओं को पूज लिया करो तो कुछ दिन हम आपके अल्लाह की उपासना कर लिया करेंगे। इस प्रकार वह चाहते थे कि कोई बीच का रास्ता निकल आए ताकि इस्लाम के सच्चाई के मार्ग के सहारे उनकी गुमराही का वजूद भी बना रहे।
इन सब बातों के जवाब में अल्लाह ने पैग़म्बर स अ व को जो आदेश दिया वह इस प्रकार है।
क़ुरआन पाक की सूरह अलकाफ़िरून की 1,2,3 व 6 वीं आयतों में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "कह दो कि ऐ काफ़िरो, मैं उनकी इबादत नहीं करता जिनकी इबादत तुम करते हो और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो जिसकी इबादत मैं करता हूँ। तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन है और मेरे लिये मेरा दीन।"
इस प्रकार बिना किसी लाग लपेट के जिस अन्दाज़ में दो टूक बात कही गई है वह मुसलमानों को राह दिखाने के लिये काफ़ी है जिसके अन्तर्गत जहां भी दीन के मामले में किसी तरह की भी मिलावट की झलक मिले उसको फौरन नकार देना चाहिए चाहे वह सूर्य नमस्कार को नमाज़ से जोड़ने की चाल हो या फिर वन्देमातरम का ग़ैरइस्लामी तसव्वुर हो। 
इस प्रकार 'तुम्हारा दीन तुम्हारे साथ और मेरा दीन मेरे साथ' वाला नजरिया ही आपसी भाईचारे को मज़बूत बना सकता है।

Friday, March 31, 2017

किसी की आस्था से छेड़छाड़ करना किसी के लिए भी लाभकारी नहीं है। Sharif Khan

ईश्वर की उपलब्ध कराई हुई नेमतों में से लोग दूध आदि अनेक पवित्र चीजों का सेवन करते हैं परन्तु कुछ लोग इन चीजों के अलावा किसी आस्था वश गाय का पेशाब भी पीते हैं। इस प्रकार यदि पेशाब में आस्था रखने वाले लोग यह कहें कि पीने की क्रिया चूँकि समान है इसलिये दूध पीने वालों को गाय का पेशाब भी पी लेना चाहिए या दूध की महत्ता को देखते हुए वह यह कहने लगें कि दूध में पेशाब मिला कर पीने से आपस का भेदभाव ख़त्म होगा और भाईचारा बढ़ेगा तो यह मूर्खता है।
वास्तव में भाईचारा बढ़ाने के लिये तो ज़रूरी यह है कि अपनी आस्था को न तो दूसरों पर थोपने की कोशिश की जाए और न ही दूसरों की आस्था पर किसी तरह का ऐतराज़ किया जाए और दोनों चीज़ों को मिलाकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश तो आपस में नफ़रत बढ़ाने वाली साबित होगी क्योंकि दूध में गाय का पेशाब मिला कर बीच का रास्ता तो बेशक कहलाएगा लेकिन वह स्वीकार्य किसी को भी न होगा।
योगी आदित्य नाथ ने जिस तरह सूर्य नमस्कार और नमाज़ कि क्रिया को समानता के पैमाने पर नापने की कोशिश की है तो वह शारीरिक क्रिया के रूप में चाहे समान हो लेकिन आस्था में समानता नहीं हो सकती जबकि नमाज़ और सूर्य नमस्कार दोनों ही अमल केवल आस्थावश ही किये जाते हैं।
इस तरह हिन्दू मुस्लिम के बीच पैदा की जा रही नफ़रत को किसी की आस्था के साथ छेड़खानी करके और ज़्यादा न बढ़ाया जाए और दोनों को अलग ही रहने दिया जाए तभी भाईचारा क़ायम रह सकता है।

Tuesday, March 28, 2017

उत्तर प्रदेश के नागरिक अपमानित जीवन जीने के लिए क्यों मजबूर किये जा रहे हैं? Sharif Khan

बहुत पुरानी बात है हमारे एक मित्र इंग्लैण्ड चले गए थे और उनको वहां की नागरिता प्राप्त हो गई थी। उनकी माँ और एक अविवाहित बहन यहीं रहते थे जिनके खर्चे के लिये वह इंग्लैण्ड से रूपये भेजा करते थे। एक बार जब वह भारत आए तब मुझसे मुलाक़ात होने पर बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद को विवाहित दर्शाया हुआ है और पत्नी के नाम के कॉलम में अपनी बहन का नाम दर्ज कराया हुआ है ताकि सरकार से मिलने वाला फ़ैमिली भत्ता हासिल कर सकें। इस प्रकार प्राप्त होने वाले उस धन को वह भारत में अपनी माँ और बहन के खर्च के लिये भेज दिया करते हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि आपकी अगर शिकायत हो जाए तो आप थोड़े से लाभ के लिये क़ानून की गिरफ़्त में आ जाएंगे। इसके जवाब में उन्होंने जो कहा केवल वह सुनाने के लिये इतनी कहानी सुनानी पड़ी है।
उन्होंने जवाब दिया था कि मुझे गर्व है उस देश का नागरिक होने पर कि जहां इस तरह की शिकायत प्राप्त होने पर सरकार यह कह कर उस शिकायत को नज़रअन्दाज़ कर देती है कि इस देश का नागरिक इस तरह का झूट नहीं बोल सकता और सरकार ऐसी शिकायत की सुनवाई करके अपने नागरिक के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाएगी।
उत्तर प्रदेश में जिस तरह सरकारी और ग़ैरसरकारी एण्टी रोमियो स्क्वाड बना कर प्रदेश भर में फैला दिये गए हैं उन्होंने ऐसा आतंक फैलाया हुआ है कि शरीफ़ लोगों के लिये अपने नौजवान बच्चों को बाहर भेजना कठिन हो गया है।
अजीब बात यह है कि क़ानून द्वारा वैध की गई लिव इन रिलेशन शिप के अन्तर्गत साथ रहने वाले बालिग़ लड़के लड़की का साथ साथ घर के बाहर निकलना किस तरह अवैध हो सकता है।
इस समय इन एण्टी रोमियो दस्तों द्ववारा की जाने वाली वारदातों में एक के अन्तर्गत तो देवरिया ज़िले में साथ साथ जा रहे भाई बहन को पकड़ कर कोतवाली ले जाया गया जहां उनके मां बाप द्वारा अपने बेटे बेटी के रूप में पहचान कराने के बाद ही उनको छोड़ा गया।
किसी शरीफ़ खानदान की बेटी को कोतवाली में ले जाए जाने पर उसके माँ बाप के दर्द को क्या विभिन्न प्रकार के आरोपों से ग्रस्त सरकार चलाने वाले लोग समझ पाएंगे? 
यहां एक ओर तो उपरोक्त इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा अपने नागरिक के सम्मान की सुरक्षा की मिसाल है और दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश में शरीफ़ लोगों को अपमानित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर किया जा रहा है।
इस प्रकार जो सरकार अपने नागरिकों के सम्मान की भी सुरक्षा करने में समर्थ न हो उसको बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

Thursday, March 23, 2017

नाइन्साफी इन्कलाब को जन्म देती है। Sharif Khan

कानून द्वारा दिए गए अधिकार का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए जब उससे बड़ी अदालत में अपील की जाती है तो इसका सीधा सा मतलब यह होता है कि अपीलकर्ता उस से निचली अदालत का फैसला मानने से इन्कार कर रहा है। उस अदालत से भी हारने के बाद उसका हाई कोर्ट में अपील करना और हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना साबित करता है की निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक के किये गए फैसले ज़रूरी नहीं हैं कि इन्साफ पर खरे उतरें। सवाल यह पैदा होता है कि इन्ही जजों को पदोन्नत करके सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जाता है तो फिर यह कैसे मान लिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक ही होगा और इन्साफ पर आधारित होगा। जब उससे निचली अदालत नाइन्साफी कर सकती है तो सुप्रीम कोर्ट में इन्साफ ही होगा इस बात की क्या दलील है? किसी अपराधी को दी जाने वाली सबसे बड़ी सजा मौत की सजा है जो सामान्यतय क़त्ल या देशद्रोह के अपराधी को दी जाती है।
मौत की सजा एक ऐसी सजा है जिसके ज़रिये से किसी शख्स को जिन्दा रहने के हक से महरूम कर दिया जाता है और इस सजा की एक ख़ास बात यह भी है कि सजा देने के बाद भूल सुधार या पुनर्विचार की गुन्जाईश ख़त्म हो जाती है।
विड़म्बना यह है कि इतनी बड़ी सजा देने का मामला जज के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि यदि उसको वह अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम (rare to rarest) की श्रेणी में नज़र आता हो तो अपराधी से जिन्दा रहने का हक छीन लिया जाय। जबकि फैसला देने वाला शख्स भी उसी समाज का हिस्सा है जो कि साम्प्रदायिक दुर्भावना, भ्रष्टाचार से लबरेज़ है और अगर वह पूर्वाग्रह से ग्रसित भी हो तो नाइन्साफी की सम्भावना बढ़ जाती है।
यदि संविधान में इस प्रकार का संशोधन किया जाना संसद के कार्यक्षेत्र में आता हो तो प्राथमिकता के तौर पर इस तरफ ध्यान देना आवश्यक है कि मौत की सजा को केवल जज के विवेकाधिकार पर आधारित न रहने दिया जाय बल्कि ऐसे फैसलों में विभिन्न धर्म गुरुओं को भी सम्मिलित रखे जाने का प्रावधान रखा जाय क्योंकि इस भौतिकवादी युग में धर्मगुरुओं के दिलों में मौजूद ईश्वर का खौफ गलत फैसले से बचाने में सहायक साबित होगा।
यह भी सच है कि नाइन्साफी इन्कलाब को जन्म दिया करती है।

Wednesday, March 22, 2017

डॉक्टर ज़ाकिर नाईक के ख़िलाफ़ सरकार की कार्रवाई हिन्दुओं पर ज़ुल्म है। Sharif Khan

डॉक्टर ज़ाकिर नाईक ने इस्लाम के साथ ही दूसरे विभिन्न धर्मों का जिस गहराई से अध्ययन किया है और वह जिस प्रकार विभिन्न धर्म के लोगों के सवालों के जवाब देकर उनको सन्तुष्ट करते हैं, यह अपने आप में एक अजूबा होने के साथ हिन्दू मुस्लिम भाईचारा क़ायम करने में सहायक हो रहा है। इसी वजह से साम्प्रदायिकता के आधार पर वजूद में आने वाली सरकार डॉक्टर ज़ाकिर नाईक जैसे महान स्कॉलर के ख़िलाफ़ देशद्रोह, आतंकवाद और ऐसे ही दूसरे बेबुनियाद आरोप लगा कर उनको अपने ज़ुल्म का शिकार बनाने पर तुली हुई है क्योंकि हिन्दू मुस्लिम भाईचारा तो इस सरकार की रीढ़ की हड्डी तोड़ने के समान साबित होगा और उससे उसके वोटरों का ध्रुवीकरण प्रभावित होकर सरकार को ही खत्म कर देगा। 
मीडिया का भी ज़ाकिर साहब पर अनजाने में होने वाला एक एहसान है कि उसने जिस तरह बंगलादेश की एक घटना को आधार बना कर उनको अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का आतंकवादी प्रचारित करना शुरू किया था उसी से पूरी दुनिया के अमन पसन्द लोग समझ गए थे कि अफ़ज़ल गुरु और याक़ूब मेमन की तरह एक और ज्यूडीशियल मर्डर की योजना बन चुकी है और उस समय डॉक्टर साहब का विदेश में होना भी उनके लिये लाभकारी साबित हुआ वरना देश में रहते हुए तो अब तक वह जेल में डाल दिये गए होते और उनके ख़िलाफ़ अदालत की आवश्यकतानुसार गवाह पैदा करके देश भर के गुण्डे 'ज़ाकिर नाईक को फांसी दो' के नारे लगा कर अदालत को फ़ैसला देने का नैतिक आधार तैयार कर चुके होते।
हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की बात करें तो डॉक्टर ज़ाकिर नाईक ग़ैर मुस्लिमों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब उन्ही की धार्मिक पुस्तकों से देने का प्रयत्न करते हैं और फिर इस्लाम से तुलना करते हुए यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि जो बुनियादी बातें उनकी धार्मिक पुस्तकों में कही गई हैं वह क़ुरआन से भिन्न नहीं हैं। 
चूँकि हर बात वह सन्दर्भ सहित कहते हैं लिहाज़ा उसके नतीजे में ग़ैरमुस्लिमों के बुद्धिजीवी वर्ग में उन सन्दर्भों के अनुसार अपनी और इस्लामी किताबों को पढ़ कर उन बातों को जांचने की उत्सुकता पैदा होती है। इस प्रकार उनमें से जो लोग सत्य को पहचान जाते हैं तो वह अपनी इच्छा से अपना धर्म भी परिवर्तित कर लेते हैं।
इस प्रकार हिन्दू समाज के जो लोग अपनी ही धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने का शौक़ नहीं रखते थे वह डॉक्टर ज़ाकिर नाईक के कार्यक्रम को देख और सुन कर उनका इस बात के लिये एहसान मानते हैं कि उनके ज़रीये से वह भी अपने धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के साथ इस्लाम से भी परिचत हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर ज़ाकिर नाईक के ख़िलाफ़ सरकार द्वारा की जाने वाली कार्रवाई बुद्धिजीवी वर्ग के इन हिन्दुओं पर भी ज़ुल्म साबित होगी।