Wednesday, March 16, 2011

भारत में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की कुन्जी Sharif Khan

लोकतन्त्र का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि जिस देश में यह क़ायम होता है अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन होना वहां की व्यवस्था का अंग बन जाता है बहुसंख्यक समाज की संस्कृति धीरे धीरे पूरे देश में छा जाती है और भीड़ तन्त्र क़ायम हो जाता है। भारतवर्ष उपरोक्त का जीता जागता नमूना है जहां धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर हिन्दू धर्मपक्षता क़ा बोलबाला है। आमतौर से विजित क़ौम विजेता क़ौम की संस्कृति व रीति रिवाज को अपना लेती है अथवा अपनाना पड़ता है परन्तु भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच विजित और विजेता का सम्बन्ध न होते हुए भी केवल बहुसंख्यक और अलपसंख्यक होने के आघार पर ही हिन्दू संस्कृति को थोपा जा रहा है जोकि संविधान के विरुद्ध है और इसमें अफ़सोसनाक पहलू यह है कि इस्लाम की मूल शिक्षाओं को न समझने वाले मुस्लिम इसको स्वीकार करके इस्लाम की छवि को बिगाड़ने में सहयोग कर रहे हैं।

उपरोक्त कथन के संदर्भ में कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।

1- यह कि, जब संविधान ने धर्मनिर्पेक्षता का सिद्धान्त लागू किया है तो किसी पुल के शिलान्यास में, सड़क के उद्घाटन में अथवा बिजलीघर आदि किसी भी सरकारी योजना के शुभारम्भ के अवसर पर नारियल तोड़ना, हवन का आयोजन अथवा इसी प्रकार के किसी भी धार्मिक अनुष्ठान किये जाने का क्या औचित्य है?

2- यह कि, विद्यालयों के समारोहों और सरकारी संस्थानों में आयोजित कराए जाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सरस्वती वन्दना, मूर्ति या तस्वीर पर माल्यार्पण अथवा इसी प्रकार के धर्माधारित कार्य कराए जाने का क्या औचित्य है।

3- यह कि, किसी सरकारी विभाग द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में ‘नटराज‘ आदि किसी देवी देवता की मूर्ति इनाम के रूप में दिये जाने का क्या औचित्य है।

इसके अलावा एक बात यह भी ग़ौर करने योग्य है कि, उपरोक्त उदाहरणों के द्वारा प्रस्तुत किये गए आयोजनों में मुख्य अतिथि यदि मुसलमान हो तो उसका इस प्रकार के इस्लामविरुद्ध कार्य करने से इंकार देशद्रोह के रूप में देखा जाता है। हो सकता है कि इस्लाम की मूल शिक्षाओं का ज्ञान न रखने वाले कुछ मुसलमान भाई भी हमारी बातों से सहमत न हों जोकि हक़ीक़त को झुठलाने जैसा होगा।

इन तथ्यों पर आधारित बात कहने का मक़सद किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना न होकर केवल यह बताना है कि इस प्रकार से मुसलमानों को धर्मविरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर किया जाना एक अजीब सी नफ़रत को जन्म देने वाला साबित होता है। यदि धर्मनिर्पेक्षता का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार उपरोक्त आयोजनों में किसी भी धर्म पर आधारित कार्यों पर रोक लगाकर इसको अपराध घोषित कर दे और मुसलमानों के द्वारा धर्मविरुद्ध कार्य किये जाने को देशभक्ति का मापदण्ड न बनाए और मुसलमानों को मुसलमान ही रहने दे तो यही छोटी सी दिखाई देने वाली बात लाज़मी तौर से हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा क़ायम करने की कुन्जी साबित होगी।

11 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

धर्म वैयक्तिक अनुपालन की चीज है। उसे वहीं तक सीमित रखा जाए और अन्य बाह्य व्यवहारों में धर्म संबंधी प्रत्येक व्यवहार को हटा लिया जाए तो बात बन सकती है।

Dr. Ayaz Ahmad said...

अच्छी पोस्ट

Sharif Khan said...

आदरणीय द्विवेदी जी, धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत भी यही कहता है कि धर्म को थोपा न जाये बल्कि उसको व्यक्तिगत तौर पर अपनाने की आज़ादी हो. आपने अपने विचारों से अवगत कराया इसके लिए आपका धन्यवाद.

एस.एम.मासूम said...

"Majority always rules "इसका कोई हल भी नहीं है और लोकतन्त्र मैं बहुसंख्यक कि ज़िम्मेदारी अल्पसंख्यको से ज़रा ज्यादा होती है.

Sharif Khan said...

एस.एम.मासूम साहब!
"Majority always rules "
यह कहावत लोकतंत्र पर ही लागू होती है इसीलिए बहुसंख्यक के ही राज करने के कारण लोकतंत्र अभिशाप बन जाता है वरना इतिहास गवाह है कि अल्पसंख्यक ने हमेशा राज किया है और तभी इन्साफ संभव हो सका है.

VICHAAR SHOONYA said...

शरीफ साहब पहली बात मैं ये कहूँगा की आप बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाले फार्मूले को भूल जाएँ. हिंदुस्तान में मुस्लिम अल्पसंख्यक बिलकुल भी नहीं. किसी भी मुस्लिम राष्ट्र से ज्यादा आबादी इस देश में मुस्लिमों की है.

दूसरी बात. मुझे लगता है की आप संस्कृति और धर्म के बीच का अंतर नहीं समझते. एक बात बताएं की क्या ऊँचा पायजामा पहनना और सर में लाल रंग की धारियों वाला अरबी साफा बांधना इस्लाम धर्म का जरुरी अंग है. मुझे नहीं लगता. मेरे हिसाब से ये सब चीजें अरबी समाज की संस्कृति में हैं पर हमारे मुस्लिम भाई इसे इस्लाम का ही एक अंग समझ कर अपनाते है. अर्थात रोड पर लगे मील के उस पत्थर को जिस पर लिखा है "मेरठ १५० कम" मेरठ समझ लेते हैं.

जरा ध्यान दे इंडोनेशिया के मुस्लिम राम कथा का चित्रण करते हैं. क्या वो मुस्लिम नहीं. उनके देश में हिन्दू मंदिर हैं. क्या उन्हें अफगानिस्तान के बुद्ध की मूर्तियों की तरह तोड़ दिया जाय. नहीं साहब इंडोनेशिया के मुस्लिम अपने देश की संस्कृति और सभ्यता का समझते हैं और उसका मान करते हैं जो करना शायद हमारे देश के लोगों को अभी तक नहीं आया.

Sharif Khan said...

VICHAAR SHOONYA साहब!
माफ़ कीजिये आपका कथन,"हिंदुस्तान में मुस्लिम अल्पसंख्यक बिलकुल भी नहीं. किसी भी मुस्लिम राष्ट्र से ज्यादा आबादी इस देश में मुस्लिमों की है."
सही नहीं है क्योंकि: अल्पसंख्यक और बहु संख्यक होना संख्या पर निर्भर न होकर अनुपात पर निर्भर होता है और चूंकि हमारे देश में मुसलमान हिन्दुओं अनुपात में कम हैं इसलिए काफी संख्या में होने के बावजूद भी अल्संख्यक ही कहलायेंगे.
दूसरी बात यह है कि :- इस लेख में धर्म के बजाये संस्कृति की ही बात पर जोर दिया गया है. गौर फरमाएं :-
"केवल बहुसंख्यक और अल्संख्यक होने के आघार पर ही हिन्दू संस्कृति को थोपा जा रहा है"

तीसरी बात यह है कि, पैग़म्बर (सल्ल०) के हुकुम के मुताबिक़ मुसलमानों को ऐसा लिबास पहनना चाहिए जिसमें टखने खुले रहें इसलिए ऊंचा पजामा पहना जाता है और जो मुसलमान ऐसा नहीं करता वह गलती पर है और उसको इसका अहसास भी है लिहाज़ा इसमें किसी को ऐतराज़ होना उसकी तंगदिली साबित करता है. भारत के मुसलमान यहाँ पहनी जाने वाली धोती अपना लेते लेकिन उसमें टांग का जितना हिस्सा खुल जाता है उसकी शरीअत इजाज़त नहीं देती इसलिए धोती को मुसलमान नहीं पहनते तो इसमें भी कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. रही रुमाल कि बात तो बनारस में अंगोछा आम तौर से हिदू मुस्लिम सभी इस्तेमाल करते हैं उसमें किसी मुसलमान को अगर ऐतराज़ हो तो वह गलती पर है. इसके अलावा एक बात यह कहनी पड़ रही है कि मुसलमानों को अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने पर भी यदि ऐतराज़ किया जाता है तो यही बात प्रस्तुत लेख के समर्थन के लिए काफी है.

सुशील बाकलीवाल said...

मजहब या धार्मिक संस्कृति के नाम पर कोई वैचारिक मतभेद होना ही नहीं चाहिये ।

ब्लागराग : क्या मैं खुश हो सकता हूँ ?

अरे... रे... आकस्मिक आक्रमण होली का !

सलीम ख़ान said...

अच्छी पोस्ट

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Vicharneey post.
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ब्लॉगवाणी: ब्लॉग समीक्षा का विनम्र प्रयास।

Kushal Pandey said...

Mr. Sharif khan mujhe lagta hai aap ko kisi doctori ilaz jarurat hai, shayad aap ka dimag kharab ho gaya hai. agar tum chaho to mai tumko ek achhe pagalo ke doctor ka naam bolta hu tum waha jake apana achhi tarah ilaj karwalo, AB TUM LOG YE CHAHTE HO KI HUM HINDU APANE BHAGWAN KI PUJA BHI NA KIYA KARE. TUM MUSLIM LOG JO YE DIN ME 5 BAR MIKE LAGA KE AJJAN PADHATE HO TO HUM KUCHH NAHI BOLATE HAI. MUSLIMO NE HUMARE HINDU BHAI YO KO BAHOT SATAYA HAI E.G. KASHMIR, U.P., KERALA. TUMHARE JAISE GHUSPAITHIYE INDIA ME RAHENE KE LAYAK NAHI HAI AGAR TUMKO ITANA BURA LAG RAHA HAI TO TUMHARE LIYE PAKISHTAN HAI NA......... JAO WAHA PE MUHAJIR BAN KE .................