Thursday, June 24, 2010

हज़रत अली (रज़ि०) का इंसाफ़

हज़रत अली की खि़लाफ़त के समय की बात है। दो मित्र साथ साथ यात्रा कर रहे थे। रास्ते में दोपहर के समय दोनों मित्र एक पेड़ के साये में विश्राम करने के लिये बैठ गए। भूख लग रही थी इसलिये भोजन, जो उनके पास था, निकालकर खाने की तैयारी करने लगे। अभी भोजन करना शुरू करने वाले ही थे कि एक मुसाफ़िर आ गया जो भूखा था तथा उसके पास खाने को भी कुछ नहीं था। इस प्रकार उस मुसाफिर को भी उन्होंने खाने में शामिल कर लिया। उनमें से एक व्यक्ति के पास पांच रोटियां तथा दूसरे के पास तीन रोटियां थीं जो तीनों नें मिलकर खाईं। उस तीसरे व्यक्ति ने उन दोनों को खाने के बदले में आठ अशर्फ़ियां दीं और चला गया। जिस व्यक्ति के पास पांच रोटियां थीं उसने पांच अशर्फ़ियां अपने पास रखकर बाक़ी की तीन अशर्फ़ियां दूसरे व्यक्ति को दे दीं परन्तु दूसरे व्यक्ति नें तीन अशर्फ़ियां लेने से इंकार कर दिया तथा कहा कि दोनों को चार चार अशर्फ़ियां मिलनी चाहिएं परन्तु पांच रोटियों वाले व्यक्ति ने कहा कि चूंकि दोनों की कुल मिलाकर आठ रोटियां थीं तथा आठ ही अशर्फ़ियां मिलीं और इस प्रकार से एक अशर्फ़ी प्रति रोटी का हिसाब आया। अतः मैंने अपनी पांच रोटियों के बदले में पांच अशर्फ़ियां ले लीं तथा तुम्हें तुम्हारी तीन रोटियों के बदले में तीन अशर्फियां दे रहा हूं। परन्तु तीन रोटियों वाला व्यक्ति अपनी बात पर अड़ा रहा तथा तीन अशर्फियां लेने से इंकार कर दिया। इस प्रकार उनमें जब कोई फैसला नहीं हो पाया तो वह दोनों व्यक्ति हज़रत अली (रज़िअल्लाहो तआला अनहो) के पास अपना फैसला कराने के लिये पहुंचे। हज़रत अली (रज़ि०) ने सारी बात ग़ौर से सुनी और तीन रोटियों वाले व्यक्ति से कहा कि तुझे इसी में फ़ायदा है कि, दूसरा व्यक्ति जो तुझे अपनी खुशी से तीन अशर्फ़ियां दे रहा है, तू उन्हें कुबूल कर ले और यदि तू ऐसा नहीं करेगा तो घाटे में रहेगा। यह सुनकर उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे तो इंसाफ़ चाहिए चाहे मैं लाभ मे रहूं या घाटे में। हज़रत अली (रज़ि०) ने फरमाया कि तुम लोगो में से एक के पास पांच रोटियां तथा दूसरे के पास तीन रोटियां थीं तथा खाने वाले तीन व्यक्ति थे। यदि यह माना जाए कि तीनों लोगों ने प्रत्येक रोटी में से बराबर बराबर खाया होगा तो प्रत्येक रोटी के तीन तीन टुकड़े करने पर आठ रोटियों के कुल चैबीस टुकड़े हुए। इस प्रकार से तीनों लोगों ने आठ आठ टुकड़े खाये। तीन रोटियों वाले व्यक्ति ने अपने नौ टुकड़ों में से आठ स्वंयं ने खा लिये तथा उसकी रोटियों में से बाक़ी बचा हुआ एक टुकड़ा तीसरे प्यक्ति ने खाया और पांच रोटियों वाले व्यक्ति की रोटियों के पन्द्रह टुकड़ों में से आठ उसने स्वंयं खाये तथा उसमें से शेष रहे सात टुकड़े तीसरे व्यक्ति ने खाये। इस प्रकार से रोटियों के आठ टुकड़ों के बदले में प्राप्त हुई आठ अशर्फ़ियों का एक अशर्फी प्रति टुकड़ा हिसाब आया। लिहाज़ा हज़रत अली (रज़ि०) ने फैसला देते हुए फरमाया कि तीन रोटियों वाले व्यक्ति को एक अशर्फ़ी तथा पांच रोटियों वाले व्यक्ति को सात अशर्फ़ियां मिलनी चाहिएं। इस फैसले से दोनों व्यक्ति खुशी खुशी चले गए।

7 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

सभी भाइयों को इत्तिला दी जाती है कि आज 2.50 बजे दोपहर डा. कान्ता के नर्सिंग होम में
मेरी वाइफ़ ने एक मासूम सी बेटी को अल्लाह के फ़ज़्ल से जन्म दिया है। उसकी कमर पर एक खुला हुआ ज़ख्म है और रीढ़ की हड्डी में पस है। उसकी दोनों टांगों में हरकत भी नहीं है। डिलीवरी नॉर्मल हुई है लेकिन बच्ची को मज़ीद इलाज की ज़रूरत है। मां की हालत ठीक है। अल्लाह का शुक्र है। वही हमारा रब है और उसी पर हम भरोसा करते हैं। अपनी हिकमतों को वही बेहतर जानता है। हमारी ज़िम्मेदारी अपने फ़र्ज़ को बेहतरीन तरीक़े से अदा करना है। सभी दुआगो साहिबान से मज़ीद दुआ की इल्तजा है। अब ब्लॉगिंग शायद नियमित नहीं रह पायेगी। बच्ची के लिये भी दौड़भाग करनी पड़ेगी।
http://vedquran.blogspot.com/2010/06/what-is-best.html

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post .

Dr. Ayaz ahmad said...

नाइस पोस्ट

Shah Nawaz said...

ज़बरदस्त इन्साफ किया हज़रात अली (र.) ने..... बहुत खूब!

marziya jafar said...

maula ali ke quol padna mujhe bahut pasand hai aur isliye unke insaaf aur quol ko padne ke liye main aksar nahjul balagh padti hoon... aur aap ne ali mula ka jo ek aur insaaf duniyawalo ko yaad dilaya hai ye qabile tarif hai... aap se yahi guzarish hai ki mualaye qyenat se jude kisse aap hamesh humse bata kijiye... taki hamari bhi jankari me bhi izafa ho sake...
shukriya...............

toshif ali said...

mujhe islamic kisse parna achcha lagta hai me hamesha purani baato ko jan nai kai liyai ussook rehta hoo aap ka bohat sukriya

अली वाले said...

हज़रत अय्यूब र.अ. नबी अल्लाह
का एक किस्सा बार बार याद आता हें एक मजलिस मे सुना था

के एक दफा हज़रत अय्यूब र.अ. कश्ती मे सवार हुवे कुछ दूर चले तभी एक बिच्छू 🦂पानी मे डूब रहा था
उनहोने उस बिच्छू 🦂को बचाने चाहा और जेसे ही हाथ ✋ बढ़ाया और झुक कर उसे उठाया बिच्छू 🦂 ने अपनी खस्लत की बिना उन्हें डंक मारा 💥 और बिच्छू फ़िर पानी मे गिरा
उनहोने फ़िर उठाना चाहा दुबारा उठाया फ़िर वही हुआ
उन्हें डंक मारा 💥 और बिच्छू फ़िर पानी मे गिरा
ये सब होता नाव का खिवय्या देख रहा था
जब हज़रत अय्यूब र.अ. ने तीसरी बार 🦂को उठाया और 🦂ने उन्हें डंक मारा 💥 और बिच्छू फ़िर पानी मे गिरा
अब खिवय्ये से रहा ना गया और बोला आप क्यू उस मूजी जानवर को बार बार बचाना चाहते हें मरने दो उसे
तब हज़रत अय्यूब र.अ. बोले वो जानवर हें और जानवर होकर अपनी खस्लत नहीँ छोड़ता तो क्या मे इंसान होकर इंसानियत भूल जाऊँ 😕 ----- जो इंसान होके इंसानियत भूल जायें वो जानवर से भी बद्तर हें

अब आप सोचिये क्या आपने किसी को बचाया हें
🦂कुछ लोग तो डंक मारेंगे ही लेकिन जिनका मज़हब ही इंसानियत (शीयत) हो उन्हें इंसानियत दिखाने मे केसा परहेज़
आइये अब तक जो गलतीयां हुई हो उनकी माफ़ी मांगे
खुदा सबसे ज्यादा रहम करने वाला हें l
और आसली शियत इख्तियार करे
और अपने छोटी भाईयो को भी ये सबक सिखाने के लिये एसा ही अमल करे
घबराए नहीँ 🦂के डंक की आदत धीरे धीरे पड़ जाएँगी

खुदा हाफ़िज़