Thursday, August 12, 2010

Independence day भारत का स्वतन्त्रता दिवस sharif khan

मानव की प्रकृति स्वतन्त्र रहने की रही है। किसी की ग़ुलामी में रहना सबसे ज़्यादा पीड़ाजनक होता है। ग़ुलामी के जीवन की भयावहता को गुलाम ही जान सकता है। ग़ुलाम एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का भी हो सकता है और एक देश किसी दूसरे देश का भी हो सकता है। हमारे देश ने भी काफ़ी समय तक अंगरेज़ों की ग़ुलामी का दंश झेला है। देशभक्ति की भावना देशवासियों में जब जागृत हुई तो अपनी जान की परवाह न करते हुए अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ आन्दोलन शुरू कर दिया और जैसे जैसे उस आन्दोलन को दबाने के लिए अंगरेज़ों के अत्याचार बढ़ते गए, आन्दोलनकारियों के हौसले भी उतने बुलन्द होते चले गए। इस प्रकार से बहुत सी क़ीमती जानों की क़ुर्बानी देने के बाद हमारा प्यारा देश 15 अगस्त 1947 को अंगरेज़ों के वजूद से पाक होकर स्वतन्त्र हो गया। अतः इस दिन को हम हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाते हैं।
देश को दो भागों में बांटकर स्वतन्त्र किया गया और इस प्रकार से पाकिस्तान वजूद में आया। भारत के इतिहास में इससे ज़्यादा ख़ुशी का दिन शायद ही कोई रहा हो। हालांकि पाकिस्तान विशेष रूप से मुसलमानों के लिये भारत में से काटकर बनाया गया था परन्तु भारत में रह रहे मुसलमानों को इस बात की आज़ादी दी गई थी कि जो स्वेच्छा से पाकिस्तान जाना चाहे वह चला जाए और जो भारत में रहना चाहे वह यहीं रहे परन्तु बहुत से मुसलमानों को एक तरफ़ तो साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा पलायन करने पर मजबूर किया गया तथा दूसरी तरफ़ रास्ते में अराजक तत्वों से उनकी सुरक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं किया गया जिसके नतीजे में लाखों की तादाद में मुसलमानों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। इस प्रकार से आज़ादी की ख़ुशी और स्वजनों की मौत के ग़म के साथ पहला स्वतन्त्रता दिवस मनाया गया। इसी तरह वर्ष पर वर्ष गुज़रते गए और 15 अगस्त 2010 को देश की स्वतन्त्रता का 64वां पर्व आ गया जिसको धूमधाम से मनाने की तैयारियां चल रही हैं। जैसी कि परम्परा रही है उसी के अनुसार इस पर्व पर देश के प्रधानमन्त्री का भाषण होगा जिसमें वह बीते वर्ष की उपलब्धियां गिनवाएंगे और भविष्य की योजनाओं से अवगत कराएंगे।
इन 63 वर्ष के अन्तराल में देश ने क्या खोया और क्या पाया ? इस प्रश्न के उत्तर पर चर्चा करें तो हम आसानी से इस नतीेजे पर पहुंच सकते हैं कि देश की आज़ादी हासिल करने में जिन लोगों ने क़ुर्बानियां दी थीं और पुलिस की बदसलूकी के अलावा जेलों में दिये गए कष्ट झेले थे, वह लोग जब तक सत्ता में रहे तब तक देश का भविष्य उज्जवल होने के लक्षण नज़र आते रहे। उसके बाद के अन्तराल को हम नैतिक मूल्यों के आधार पर दो चरणों में बांट सकते हैं।
पहले चरण में शासन की बागडोर जिन लोगों के हाथों में आई उनमें देश के प्रति तो बेशक प्रेम, लगाव और सेवा भावना थी परन्तु सत्ता प्राप्त करने के लिए उन लोगों नें गुण्डों, बदमाशों और विभिé प्रकार के अपराधी तत्वों का सहारा लेना प्रारम्भ कर दिया था। इस प्रकार से अपराधी वर्ग के लोग किंग-मेकर की हैसियत से समाज के प्रतिष्ठित लोगों में सम्मिलित होने लगे और यहीं से नैतिक पतन आरम्भ हो गया। इसके साथ ही सरकार बनाने में सहायक रहे उन अपराधी वर्ग के लोगों को नाजाइज फायदे पहुंचाकर सन्तुष्ट करना शासक वर्ग की मजबूरी हो गई तथा इस प्रकार से शासक वर्ग द्वारा निर्देशित प्रशासन में भ्रष्टाचार पनपना शुरू हो गया। पुलिस विभाग में अपराधियों की बैठ-उठ शुरू होने से नैतिक मूल्यों में गिरावट लाजमी थी।
दूसरे चरण में देश की राजनैतिक व्यवस्था पर पूर्ण रूप से उन लोगों का क़ब्ज़ा हो गया जो पहले चरण में किंग-मेकर थे। इस प्रकार से अराजकता, भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता हमारे देश की राष्ट्रीय पहचान बन गईं। इस समय हमारा देश इसी नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है।
ऐसे हालात में भी मायूस होने के बजाय कुछ उपाय करना आवश्यक हो गया है। जिस प्रकार से देश के जागरूक नागरिकों ने देश पर राज करने वाले विदेशियों के पन्जे से देश को आज़ाद करा लिया था उसी प्रकार ऐसे लोगों की एक बार फिर परीक्षा की घड़ी आ गई है जोकि पहले से आसान है।
करना केवल यह है कि जनता में इस बात की जागृति पैदा की जाए कि वह अपने वोट का सही प्रयोग करना सीख ले और भ्रष्ट नेताओं के चंगुल से देश को आज़ाद कराने में सहयोग करे तभी सही आर्थों में स्वतन्त्रता दिवस का पर्व मनाने में एक अजीब क़िस्म के आनन्द की अनुभूति होगी।

10 comments:

MLA said...

Badhia lekh. Ap Achha likhte hai, very good.

Sharif Khan said...

MLA sahib!
आप हकीक़तपसंद हैं इसलिए आपको लेख अच्छा लगा. आपका शुक्रिया.

HAKEEM YUNUS KHAN said...

आज़ादी तो तब ही होगी जब हम देश के, समाज के ग़लत तत्वों के उत्पीडन से आज़ाद न हो जाएँ, आज़ादी तो तब ही होगी जब अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी हो (अभिव्यक्ति का मतलब यह नहीं किसी को गाली देने का मन हो तो बक दिया, अपनी सार्थक और सत्य बातें कहने की आज़ादी अभिव्यक्ति की असल आज़ादी कहलाती है), आज़ादी तो तब ही होगी जब हिंसा का दुरुपयोग न होगा, आज़ादी तो तब ही होगी जब देश के हर एक व्यक्ति की सेहत की सुरक्षा के लिए एक आम और सशक्त योजना हो और उस पर इमानदारी से कार्यान्वयन हो, आज़ादी तो तब ही होगी जब अपनी शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति का खात्मा होगा.
Nice Post.
Nice comment by Shri. Sugyu

"रमज़ान के पवित्र दिनों में
रोज़े का पवित्र भाव : वासनाओं व इच्छाओं का परित्याग कर काया व मन को शुद्ध करने का भाव
सभी के अन्तरमन में बिराजमान हो।"

शुभ कामनाएं॥

HAKEEM YUNUS KHAN said...

Please tell us proper solution .

HAKEEM YUNUS KHAN said...

मैं तो उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब इस देश बल्कि पूरी दुनियाँ में अमीर-ग़रीब का फासला ख़त्म होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब गोरे-काले का ज़मीनी स्तर पर, दिल के स्तर पर फासला खात्मा होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब ऊँच ज़ात-नीच ज़ात का वाहियात तंत्र ख़त्म होगा, उसी दिन आज़ादी का असल मायने बता पाने में सक्षम हो सकूँगा जब एक बलात्कारी को मौत की सज़ा देने का प्रावधान न हो सके!

Dr. Ayaz Ahmad said...

कैसी आज़ादी ? हम लोग गोरे अंग्रेज़ो की गुलामी से आज़ाद होकर काले अंग्रेज़ो (भ्रष्ट राजनेताओ) की गुलामी मे आ गए अब इससे आज़ाद होने के लिए एक लम्बे संघर्ष की ज़रूरत है जिसके लिए देश बिल्कुल तैयार दिखाई नही देता

HAKEEM YUNUS KHAN said...

Apne mere sawal ka jawab nahin diya ab tak ?

DR. ANWER JAMAL said...

नेताओं में जब तक ‘तक़वा’ अर्थात ज़ुल्म-ज़्यादती और पाप से बचने का भाव नहीं जगेगा तब तक लोगों की कोई समस्या हल न हो सकेगी, देश चाहे ‘यह’ हो या ‘वह’ या फिर कोई तीसरा।
ईश्वर एक है और मानव जाति को भी एक हो जाना चाहिये। अलगाववाद और हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। एक परमेश्वर की वंदना और उसके आदेशों का पालन ही हरेक समस्या का सच्चा और स्थायी समाधान है।

अपनीवाणी said...

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भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

या तो आपने इतिहास पढ़ा नहीं या लोगों को बेवकूफ समझते हैं अथवा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. लाहौर से आने वाली ट्रेन में हिन्दू और सिखों की लाशें भरी हुई थीं. मुसलमान तो मेहमान की तरह भेजे गये थे.