Monday, July 5, 2010
देश की मुख्यधारा क़ुरान की रोशनी में
उपरोक्त आदेश उन लोगों के लिए है जो ईमान वाले हैं। ईमान वाले वह लोग होते हैं जो अल्लाह का हुकुम मानने वाले हों। अतः इस आयत में दिये गए आदेश के अनुसार अमल करके हम समाज में फैली हुई बहुत सी बुराइयों को दूर करने में सहायक हो सकते हैं। आजकल खाने पीने की चीज़ों और दवाइयों आदि में मिलावट करके जो लोग इन्सानों की ज़िन्दगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं उनकी ओर से नज़र बचाने के बजाय हमको चाहिए कि ऐसे घिनौने काम करने वाले समाज दुश्मन तत्वों की जानकारी यदि हम रखते हों तो इस बात की सूचना हम सम्बन्धित सरकारी विभागों को दें चाहे इससे हमारा कोई निजी नुकसान होता हो या हमारा कोई सगा सम्बन्धी ही क्यों न प्रभावित हो रहा हो।
इस काम के करने में हो सकता है कुछ ऐसी अड़चनें आएं जिनकी आपने कल्पना भी न की हो। उदाहरण के तौर पर जब आप इस बिगड़े हुए समाज में सुधार की बात करेंगे तो हो सकता है कि आपके कुछ ऐसे मित्र व सम्बन्धी आपके खि़लाफ़ हो जाएं जिनके उन मिलावटखोरों से मधुर सम्बनध हों जिनके खि़लाफ़ आप कार्रवाई करने जा रहे हैं। दूसरी दिक्क़त आपको सम्बन्धित सरकारी विभागों व पुलिस के उन भ्रष्ट कर्मचारियों से पेश आ सकती है जिनकी सरपरस्ती में यह धन्धा फलफूल रहा है। तीसरी दिक्क़त उन राजनैतिक नेताओं से आ सकती है जिनकी परवरिश इसी गन्दगी में हुई है और अब सफ़ेदपोश लोगों में शामिल होकर चोरी छिपे इन अपराधों में सहायता कर रहे हैं।
इस कार्य को अकेले करने के बजाय यदि संस्थागत (इजतेमाई) तौर से किया जाए और देश की मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाए तो मुख्यधारा का ढिंढोरा पीटने वालों में शामिल मिलावटखोरों को प्रायश्चित् करने का अवसर भी मिल जाएगा।
Friday, July 2, 2010
आनर किलिंग एक समस्या और उसका समाधान
विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में मैसोपोटामिया (इराक़), भारत व चीन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारत की सभ्यता व संस्कृति का एक गौरवमयी इतिहास रहा है जिसको किसी भी प्रकार से नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। सभ्यता का वजूद क़ायम रहे, इसके लिए आवश्यक है आदर्श समाज का निर्माण। भारत में समय समय पर जन्म लेने वाले महापुरुषों का आदर्श समाज के निर्माण में जो योगदान रहा है उसके महत्त्व को भुलाया नहीं जा सकता। परिवार समाज की इकाई होता है। एक परिवार में जो स्त्री-पुरुष होते हैं उनमें परस्पर बाप-बेटी, मां-बेटा तथा बहन-भाई के सम्बन्ध तो जन्म के आधार पर होते हैं परन्तु पति-पत्नि का सम्बन्ध समाज के द्वारा मान्यता दिये जाने पर ही वैध होता है जिसको हम विवाह कहते हैं। समाज निर्माण के लिये जो परम्पराएं बनाई गईं, जिन बातों को निषिद्ध किया गया तथा जिन बातों का समावेश करके मान्यता दी गई इसी को हम संस्कृति कहते हैं। अपनी संस्कृति से लगाव होना मानव प्रकृति का अंग है।
अंग्रेज़ों के चंगुल से देश तो आज़ाद हो गया लेकिन मानसिक रूप से भारत की जनता और विशेष रूप से संविधान निर्माता उनकी ग़ुलामी से आज़ाद न हो सके और उसके बाद शासन की बागडोर सम्भालने वाले नेता भी किसी न किसी रूप में उसी मानसिकता से दबावग्रस्त रहे जिसके नतीजे में आज का सामाजिक ढांचा बिगाड़ के कगार खड़ा है। संविधान निर्माताओं ने विशेष रूप से इंगलैंड, अमेरिका, फ्रांस व इटली के संविधानों की मदद से अपने देश का संविधान बनाया। मानसिक ग़ुलामी का इससे बढ़कर और क्या सबूत हो सकता है कि जिन गोरी चमड़ी वालों से देश को आज़ाद कराया था, उन्ही के संवैधानिक ढांचे के अनुसार निर्मित संविधान देश पर थोप दिया गया। ‘‘कौवा चला हंस की चाल, अपनी चाल भी भूल गया।‘‘ इस कहावत में कौवे का प्रगतिशील होना तो कम से कम दिखाई दे रहा है क्योंकि उसने अपने से बेहतर की नकल करने की कोशिश की लेकिन हमारे देश के नेताओं ने तो इस कहावत ही को पलट दिया। सभ्यता व संस्कृति के नाम पर शून्य अमेरिका जैसे भौतिकवादी देश का महान सभ्यता व संस्कृति वाला महान भारत देश यदि अनुसरण करता है तो फिर कहावत ऐसे होगी, ‘‘हंस चला कौवे की चाल, अपनी चाल भी बरबाद कर दी।‘‘
आज़ादी मिलने के बाद देश में लोकतान्त्रिक ढांचे की रूपरेखा बनाई गई। लोकतन्त्र की परिभाषानुसार सरकार ऐसी होनी चाहिए जो जनता की हो, जनता द्वारा निर्वाचित हो तथा जनता के लिए हो। लिहाज़ा जनता के हितों को दृष्टि में रखते हुए जनता की इच्छा व आवश्यकतानुसार क़ानून बनाये जाएं तथा आवश्यकता पड़ने पर संविधान में संशोधन का भी प्रावधान रखा गया। विधायिका का कार्य आवश्यकतानुसार संविधान में संशोधन करना तथा न्यायपालिका का कार्य उसकी व्याख्या करना है। अब हम सूत्रवार अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न करते हैं
1- यह कि, देश की जनता ने जब समलैंगिकता को जायज़ क़रार दिये जाने की कभी मांग नहीं की तो फिर मानवता को कलंकित करने वाले ऐसे घिनौने कृत्य को क्यों क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान किया जा रहा है ?
2- यह कि, देश की जनता ने जब वयस्क लड़के-लड़कियों को बिना विवाह किये साथ रहने की कभी मांग नहीं की तो फिर विवाह के द्वारा बनाए गए सामाजिक ढांचे को छिé भिé करने के लिए ‘लिव इन रिलेशनशिप‘ का क़ानून में प्रावधान करने की क्यों कोशिश की जा रही है ?
3- यह कि, देश की जनता अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को बचाने के लिए जब अपने जिगर के टुकड़ों तक की बलि देने को तैयार है तो फिर मां, बाप और समाज को ठेंगा दिखाकर घर से भागकर ब्याह रचाने वाले कम उम्र युवक युवतियों को विशिष्टता प्रदान करके क्यों सामाजिक ढांचे को छिé भिé करने की कोशिश की जा रही है ?
विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा मीडिया लोकतन्त्र के यह चार स्तम्भ हैं। इनको संचालित करने वालेे लोग कहीं दूसरे देश से न आकर इसी सामाजिक परिवेश का अंग हैं परन्तु उपरोक्त तीन सूत्रों में दर्शाई गई बातों पर यदि ग़ौर करें तो क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता जैसे सबने मिलकर देश की संस्कृति का जनाज़ा निकालने की एकसूत्रीय कार्ययोजना तैयार की हुई है ?
ऐसी विकट परिस्थिति में, बजाय मायूस होने या देश के वातावरण को दूषित होते देख शर्म से गर्दन झुकाकर बैठे रहने के, बुद्धिजीवी वर्ग को चाहिए कि इस समस्या पर बहस करके समाधान खेजने की कोशिश करें वरना भारत जैसे महान देश में भी निकट भविष्य में अमेरिका जैसा मानवता को कलंकित करने वाला माहौल बनते देर नहीं लगेगी और फिर बच्चे पैदा होने के बाद विवाह के बारे में विचार किया जाया करेगा। उचित मार्गदर्शन करने वाले बुजुर्गों को तो वृद्धाश्रम में भेजकर पीछा छुड़ाने चलन बनने लगा है ही।
उपरोक्त सूत्रवार कही गई बातों को समस्या का जो रूप दे दिया गया है उसके समाधान के लिये सुझाव के तौर पर हम यह कह सकते हें कि सूत्र नं. 1 व 2 वाले कृत्य को वैधानिक संरक्षण देने के बजाय अपराध घोषित किया जाए तथा नं. 3 के अंतर्गत किये गए विवाह को मान्यता देने के लिये नियमों को कड़ा करने की आवश्यकता पर बल दिया जाए। जैसे कि ऐसे विवाह की मान्यता के लिये आयु 25 वर्ष या अधिक रखी जाए क्योंकि कम उम्र में प्रेम न होकर वासना ही होती है तथा 25 साल की उम्र के बाद प्रेम और वासना के अन्तर को समझने की क्षमता पैदा हो जाती है। ध्यान रहे, ऐसे विवाह प्रायः 25 वर्ष से कम उम्र के अपरिपक्व मस्तिष्क के युगल ही करते हैं। सामाजिक मान्यताओं के ख़िलाफ़ किये गए विवाह के द्वारा अपने समाज के बुज़ुर्गों की मान मर्यादा का उल्लंघन करके रचाए गए विवाह को क़ानून चाहे संरक्षण दे परन्तु ऐसे प्रेमी युगलों को शारीरिक यातना देने के बजाय सामाजिक बहिष्कार के तौर पर दण्डित तो किया ही जा सकता है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप आनर किलिंग के नाम पर की जाने वाली हत्याओं में काफ़ी हद तक कमी आ सकती है।
Wednesday, June 30, 2010
सत्य के खिलाफ़ असत्य एकजुट
Saturday, June 26, 2010
पुलिस के लिए पापों के प्रायश्चित् का सुनहरी मौक़ा
1857 की क्रांति की विफलता के बाद अंग्रेज़ों ने जब दोबारा भारत में शासन की बागडोर संभाली तब शासन को मज़बूती प्रदान करने के लिए सरकार को एक ऐसे तन्त्र की ज़रूरत पेश आई जिस का जनता में भय व्याप्त हो। इसी नीति के तहत अंगे्रज़ी सरकार ने पुलिस तन्त्र कायम किया जिसका मक़सद केवल जनता के दिल में ख़ौफ़ पैदा करके हुकूमत करना था। सरकार की यह योजना कामयाब भी रही परन्तु पुलिस को सरकार ने निरंकुश होकर जनता पर अत्याचार करने की छूट फिर भी नहीं दी। जिसके नतीजे में न तो उस ज़माने की पुलिस कीे हिरासत में बेक़सूरों की मौत होती थीं, न फ़र्जी मुठभेड़ दिखाकर खुलेआम क़त्ल होते थे और न ही पुलिस थानों में महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं होती थीं। आज 21वीं सदी में सभ्यता का ढिंढोरा पीटने वाली डांवाडोल सरकारों को इतनी फुर्सत ही नहीं है कि पुलिस द्वारा जनता पर किये जा रहे जु़ल्मों की ओर ध्यान दे सके। एक छोटा सा सुझाव यदि मान लिया जाये तो हो सकता है कि इसका शीघ्र ही अच्छा नतीजा सामने आये। सुझाव इस प्रकार है कि हर शहर और गांव में जनता की सेवा के लिए प्याऊ लगाई जाये जिसका प्रबन्ध केवल पुलिस विभाग करे तथा इसके नाम पर जनता से उगाही न हो यह सुनिश्चित कर लिया जाये। साथ ही ऐसा चक्र बनाया जाये कि माह में कम से कम एक बार प्रत्येक अधिकारी व कर्मचारी को जनता को पानी पिलाने की इस सेवा का सुअवसर प्राप्त हो सके। इस प्रकार के कार्यक्रम से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि पुलिस में सेवा भावना पैदा होगी, अहंकार पर अंकुश लगेगा तथा और भी यदि कुछ न हुआ तो कम से कम इसी बहाने कुछ पापों का तो प्रायश्चित हो ही जायेगा।
Thursday, June 24, 2010
हज़रत अली (रज़ि०) का इंसाफ़
Wednesday, June 23, 2010
मानवता और पुलिस
Sunday, June 20, 2010
फ़तवों का मज़ाक़ उडा़ने का किसी को भी हक़ नहीं
शरीफ़ ख़ान