Monday, July 19, 2010

कर्ज़न के गधे by-sharif khan

अंगरेज़ों के राज में भारत के वायसराय लार्ड कर्ज़न जब अपने देश वापस जाने लगे तो परम्परानुसार उन्होंने लोगों को उनकी हैसियत और ख़िदमत के मुताबिक़ पुरस्कार आदि दिये। जैसी कि एक कहावत है कि, ‘‘दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है‘‘ के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा जिस व्यक्ति से वह खुश थे वह था उनका बावर्ची (रसोइया) लिहाज़ा उसको उसी की इच्छानुसार इनाम देने के लिये उससे कहा कि चूंकि तुमने हमारी बहुत सेवा की है और बहुत लज़ीज़ खाने खिलाए हैं इसलिए हम चाहते हैं कि तुम जो मांगना चाहो वह हमसे मांग लो। यह सुनकर बावर्ची ने कहा कि सरकार आपने सदैव मेरा ख़याल रखा है इसलिए मुझे जो कुछ आप देंगे उस से बेहतर मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता लेकिन जब उससे दोबारा उसकी इच्छा पूछी गई तो उसने कहा कि हुज़ूर मेरा बेटा पढ़ने में कमज़ोर होने के कारण हाई स्कूल में फ़ेल हो गया है। यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरे बेटे को कलक्टर बना दीजिए। और इस प्रकार से उस बावर्ची का हाई स्कूल फ़ेल पुत्र कलक्टर बना दिया गया। ऐसे विशिष्ट पद उपरोक्त पाविारिक पृष्ठभूमि व शैक्षिक योग्यता वाले व्यक्ति के को सौंपा जाना एक अजूबा था और अजूबा ही साबित भी हुआ क्योंकि उसने अपने स्तर के अनुसार ऐसे अनाप शनाप काम किये कि जल्दी ही उसके ख़िलाफ़ शिकायतों की एक पूरी फ़ाइल तैयार हो गई परन्तु उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में कोई भी सक्षम नहीं था। अन्त में उसके ख़िलाफ़ तैयार की गई फ़ाइल को लार्ड कर्ज़न के अवलोकनार्थ इस टिप्पणी के साथ इंग्लैण्ड भेजा गया कि कृपया अपने इस गधे के कारनामों पर विचार करके निर्देश देने का कष्ट करें।
जवाब में लार्ड कर्ज़न ने लिखा कि भारत में बहुत सारे गधे पल रहे हैं उनके साथ यदि मेरा भी एक गधा परवरिश पाता रहेगा तो देश का बहुत ज़्यादा अहित न होगा।
उपरोक्त कथन चाहे सच पर आधारित न हो परन्तु यदि हम बारीकी से देखें तो क्या प्रत्येक क्षेत्र में कर्ज़न के गधे मौजूद नहीं हैं? पुलिस हो चाहे प्रशासन हो, ऐसे अजीब फ़ैसले लिये जाते हैं कि सुनकर हैरानी होती है। पुलिस हिरासत में मौत (क़त्ल), फ़र्जी मुठभेड़ के द्वारा क़त्ल और आला अधिकारियों के द्वारा इस प्रकार के अपराधियों का पक्ष लेना आदि वारदातों की बाढ़ सी आई हुई है और ऐसे नरपिशाचों की सरपरस्ती करने के लिये देश में ही बहुत सारे कर्ज़न मौजूद हैं। बुद्धिजीवी वर्ग इस ओर भी ध्यान देकर यदि कुछ समाधान निकाल सके तो देशहित में योगदान होगा।

10 comments:

विश्‍व गौरव said...

बहुत बढिया चारों तरफ गधे दिखायी देते हैं पर आज पता चला यह गधे ऐसे बने हैं

Anonymous said...

आज भी हर देश में यही कर रहे हैं

Anonymous said...

और चरमपंथी संगठनों को भरपूर खुराक मुहैया करा रहा है

honesty project democracy said...

परन्तु यदि हम बारीकी से देखें तो क्या प्रत्येक क्षेत्र में कर्ज़न के गधे मौजूद नहीं हैं ?

हमारा जवाब है की हमारे देश में हर क्षेत्र में 95 % कर्जन के गधे ही मौजूद हैं रेस के घोरों को तो कोई पूछने वाला है ही नहीं यहाँ तक की हमारे देश के महत्वपूर्ण पदों पर भी यही हाल है और इसका समाधान है -जनता का डर जिसदिन से इस देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को होगा उसी दिन से इसका समाधान निकलना शुरू हो जायेगा और ऐसा तब होगा जब हमसब एकजुट होकर मुर्दा से जिन्दा होने का प्रयास करेंगे ....

Anonymous said...

दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है

Anonymous said...

Islamic Personality


The Muslim Has No Free Time


From Ibn 'Abbaas (radiyallaahu 'anhumaa) who said that Allaah's Messenger (salallaahu 'alaihi wa'sallam) said: There are two blessings which many people lose: health and free time.



Bukharee

Anonymous said...

So how can one who has no free time preoccupy himself with this world? How can one whose time is filled experience free time?

what one of the scholars said about one of the Imaams : 'I was a neighbour of his at the school in Cairo, my house was above his house. For twelve years, I did not awake on any night, at any hour of the night except that I noticed candle light in his house and he was occupied with knowledge. Even when he was eating, his books would be with him and he was occupied with them.

सत्य गौतम said...

‘ब्लाग संसद‘ सवर्ण ब्लागर्स का हस्तमैथुन है, आभासी जगत का अद्भुत हस्तमैथुन है यह। हस्तमैथुन के परिणाम वास्तव में बहुत बुरे होते हैं। आप भी यह देर सवेर यह जान ही जाएंगे।
महक जी ! मैंने जो देखा और सोचा वह आपके सामने रख दिया। बहन जी सी.एम. हैं और दलित पिट रहे हैं, आपने कह तो दिया लेकिन यह देखने की जरूरत न समझी कि दलित क्यों पिट रहा है और उसे पीटने मारने वाले लोग कौन हैं ?
वे लोग हैं आपके सहजाति सवर्ण।
बहन जी के होने से यह लाभ तो है कि पीड़ित की रिपोर्ट दर्ज हो जाती है और उसे निश्चित अवधि में मुआवजा मिल जाता है जबकि जहां सी.एम. सवर्ण जाति से है वहां तो यह भी नहीं हो पाता। कानून में तो मर्डर करना भी मना है लेकिन क्या किसी भी प्रदेश में हत्या का होना रूक गया है ?
अपराध के पीछे जो मूल कारक तत्व होते हैं, जो सामाजिक सोच होती है उसे बदले बिना किसी भी अपराध का सफाया नहीं किया जा सकता। दलितों के प्रति किये जाने वाले अपराधों के पीछे भी सामाजिक सोच उत्तरदायी है और इसे कोई भी सी.एम. अपनी राजनैतिक ताकत के बल से नहीं बदल सकता। आपको बहन जी के मूर्ति लगाये जाने से बड़ा कष्ट पहुंच रहा है और जो हर चैराहे पर दलितों का दमन करने वालों को देवता बनाकर उनकी मूर्तियों की पाखण्डपूर्ण पूजन-अर्चन किया जा रहा है क्या वह जनता के धन-श्रम का दुरूपयोग नहीं है ?
हरेक आदमी कमजोर की तरफ ही लपकता है , आप भी मुझे कमजोर देखकर ही गरजे । कोई मुझे कैरानवी बता रहा है और कोई महक । भूमि का क्या जोड़ आकाश से और मैं तो भूमि भी नहीं पाताल हूं। संसद बनाने से क्या होगा ?कानून अगर बुरा भी हो लेकिन उसे लागू करने वाले कुशल और न्यायप्रिय हों तो रिजल्ट अच्छा आता है लेकिन अगर आपने कानून अच्छा भी बना लिया तो क्या ? अगर उसे लागू करने वाले ही भ्रष्ट हुए।
भ्रष्टाचार कैसे मिटे ?
प्रश्न यह है लेकिन आप मूल प्रश्न का समाधान न खोजकर चिंतक बनने की धुन पाले हुए हैं। मैं आपको समस्या से उसकी प्रकृति और वास्तविकता से परिचित करा रहा हूं लेकिन आप मुझे कुएं का मेंढक कह रहे हैं। उतर गया आपका उदार और नर्म बनने का सारा ढोंग ?
कुवांरे लड़के जवान होते हैं। उनकी जवानी एक जवान साथी मांगती है लेकिन वह उनके पास होता नहीं तो वे क्या करते हैं ?
वे हस्तमैथुन करते हैं। उन्हें तृप्ति मिल जाती है। उन्हें लगता है कि उनकी समस्या का समाधान हो गया परन्तु उनकी समस्या का समाधान वास्तव में तब होता है जब उनका विवाह हो जाता है।

Sharif Khan said...

सत्य गौतम ji!
श्रीमानजी, बात किसी भी विषय के अंतर्गत हो आप दलित और सवर्ण के बीच भेदभाव के चश्मे से देखने के अभ्यस्थ हो गए हैं. इस के पीछे कारण है पिछले पांच हज़ार साल के अरसे में सवर्णों के द्वारा दलितों पर किये गए अत्याचार-जनित नफ़रत, बदले की भावना और जालिमों को जवाब देनें की क्षमता का दलितों में विकास होना. अच्छा इंसान वह है जो दूसरे इंसानों को भी अपने ही जैसा इंसान समझे. यदि दूसरों ने आप के साथ अच्छा व्यवहार न करके मानवता को कलंकित करने वाला कार्य किया है तो आप उस रास्ते पर न चलें बल्कि अच्छे इंसान होने का सबूत पेश करते हुए जालिमों को माफ़ कर दें और उनपर एहसान करने की सिर्फ उस हद तक कोशिश करें की यह लोग उस को अपना हक न समझने लगें.

PADMSINGH said...

खान साब !
बहुत सधे शब्दों में बहुत सटीक बात करते हैं आप ! आपकी पोस्ट पर कमेन्ट करने के लिए दोचार पोस्ट लिखनी पड़ सकती है ... फिलहाल तो व्यवस्था का यही हाल है... सत्य गौतम जी ने जो कहा वो अर्धसत्य हो सकता है ... मै अपने विभाग में ही देखता हूँ कोटे से प्रमोट किये गए अधिकारी जिनमे अपने से काफी जूनियर स्तर के कार्मिकों जितनी भी सामर्थ्य नहीं है तुगलकी फरमान जारी करते और उलटे सीधे काम करते दिख जाते हैं ... टेंडरों में मनमानी और खुला भ्रष्टाचार हो रहा है .. सब कुछ देखते हुए कोई कुछ भी नहीं कर सकता क्योकि "अधिकार अधिकारियों के लिए होता है.. कर्तव्य कर्मचारियों के लिए"