Saturday, July 17, 2010

holy books are respectable पवित्र ग्रन्थ की ग़लत व्याख्या करना मानसिक दिवालियापन sharif khan

स्वतन्त्र भारत में देश के संविधान ने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता बेशक दी है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी धर्म और आस्थाओं के खि़लाफ़ कोई भी ऐसी टिप्पणी या अनर्गल बात कही जाए जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचने का अन्देशा हो। बंगलादेश की कुख्यात लेखिका ‘तस्लीमा नसरीन’ ने एक अंग्रेज़ी अख़बार में पवित्र क़ुरआन की ग़लत व्याख्या देकर अपनी जहालत और इस्लाम दुश्मनी का सबूत पेश किया है। उदाहरण के तौर पर क़ुरआन के हवाले से वह कहती हैं कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है, जबकि पृथ्वी पहाड़ों की मदद से अपनी जगह रुकी हुई है। हालांकि क़ुरआन में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा। क़ुरआन की ग़लत व्याख्या करके लेखिका का मक़सद शायद यह साबित करना रहा हो कि सृष्टि की रचना करने वाले अल्लाह को ऐसे सामान्य से तथ्यों का भी ज्ञान नहीं है जिनको एक हाई स्कूल का छात्र भी जानता है। इसी लिये हम सभी को पैदा करने वाले की पवित्र किताब में ग़लती निकालने के बजाय उसकी आयतों का सही मतलब जान लिया गया होता तो उपरोक्त लेखिका का मानसिक दिवालियापन ज़ाहिर न होता।
पवित्र क़ुरआन के 36वें अध्याय की 38वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘और सूरज अपने ठिकाने की ओर जा रहा है।’’ इससे सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाना कहीं भी साबित नहीं होता। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में ‘सन’ की व्याख्या में यह लिखा है कि सौरमण्डल 20 किलोमीटर प्रति सेकिण्ड के वेग से चल रहा है। अर्थात सूर्य अपने ग्रहों सहित उपरोक्त वेग से चल रहा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि पवित्र कु़रआन में यह बात उस समय कही गई थी जब यह माना जाता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और चांद सूरज आदि सब उसके चक्कर लगा रहे हैं। फिर यह माना जाने लगा कि सूर्य एक जगह रुका हुआ है और पृथ्वी उसके चक्कर लगा रही है। इस प्रकार से जैसे जैसे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती गई उसी के अनुसार वह उन तथ्यों से अवगत होता गया जिनसे पहले अनभिज्ञ था। परन्तु क़ुरआन तो जैसा प्रारम्भ में था वह ही आज है और हमेशा ऐसा ही रहेगा।
इसके बाद वह लिखती हैं कि क़ुरआन में महिलाओं को ग़ुलाम तथा कामवासना को शान्त करने का साधन मात्र कहा गया है।
इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन की दो आयतों का हवाला देना ही पर्याप्त होगा। दूसरे अध्याय की 187वीं आयत में पति-पत्नि के आपसी सम्बन्ध के सिलसिले में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो।’’ इन थोड़े से शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया है। अर्थात जिस प्रकार लिबास शरीर की सुरक्षा करता है, उसी प्रकार पति-पत्नि एक दूसरे की सुरक्षा करें। और शरीर के लिए जिस प्रकार से लिबास सौन्दर्य का साधन होता है, उसी प्रकार से पति-पत्नि भी एक दूसरे की ज़ीनत बनकर रहें तथा जिस प्रकार जिस्म और लिबास के बीच कोई पर्दा नहीं होता, उसी प्रकार पति-पत्नि के बीच कोई पर्दा नहीं होता। यदि महिलाओं को ग़ुलाम समझा गया होता तो क्या उनमें परस्पर जिस्म और लिबास का सम्बन्ध क़ायम करने की बात कही जा सकती थी। इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन के अध्याय चार की 34वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि मर्द औरतों पर क़व्वाम हैं, इस बिना पर कि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर फ़ज़ीलत दी है।’’ जैसा कि सभी जानते हैं कि शारीरिक दृष्टि से तथा धैर्यवान होने आदि अनेक बातों में मर्द औरत की तुलना में बेहतर और मज़बूत होता है इसीलिए अल्लाह ने मर्द को औरत का क़व्वाम बनाकर ज़्यादा ज़िम्म्मेदारी सौप दी क्योंकि क़व्वाम कहते हैं सुरक्षा करने वाला तथा खाने पहनने व दूसरी हर प्रकार के हितों की देखभाल करने वाला और ज़रूरतों को पूरा करने वाला। इसका साफ़ मतलब यह है कि महिलाओं को हर प्रकार के टेन्शन से आज़ाद कर दिया। इस कथन में तो मर्द ग़ुलामों वाले काम करता हुआ प्रतीत होता है न कि औरत परन्तु तसलीमा नसरीन ने पता नहीं किस तरह से औरतों को मर्दों का ग़ुलाम समझे जाने का मतलब निकाल लिया।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमको चाहिए कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थों की अपने तौर से ग़लत व्याख्या करने का प्रयास करने के बजाय उनमें दी गई शिक्षाओं से लोगों को अवगत कराने कोशिश करके आपसी भाईचारे को बढ़ाने में मददगार साबित हों।

15 comments:

shahadat said...

अच्छी जानकारी दी है. शुक्रिया.

Anonymous said...

very good post.

Anonymous said...

‘‘वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो।’’
कितनी सादगी से सबकुछ कह दिया.

shahadat said...

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमको चाहिए कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थों की अपने तौर से ग़लत व्याख्या करने का प्रयास करने के बजाय उनमें दी गई शिक्षाओं से लोगों को अवगत कराने कोशिश करके आपसी भाईचारे को बढ़ाने में मददगार साबित हों।

shahadat said...

गलती पर टोकना अच्छा है परन्तु भाषा नम्र हो.

Sharif Khan said...

shahadat ji!
आप ने सही बात के लिए रहनुमाई की इसके लिए शुक्रिया.

Anonymous said...

holy books are respectable. it is a fact.

सहसपुरिया said...

आपने सही मुद्दा उठाया है, लेकिन कुछ लोग हैं जो रूप बदल कर ऐसी हरकते करते रहते हैं. इनका मक़सद अमन की फ़िज़ा को खराब करना है. लेकिन ये लोग नही समझते आख़िर में इनके हाथ ज़िल्लत के सिवा कुछ नही आएगा.
बहरहाल , आपकी कोशिश की में तारीफ़ करता हूँ.

सत्य गौतम said...

@खान साहब! आप भी स्वर्ण मानसिकता से ग्रस्त हैं। आप सब एक ही रोग के मारे हुए हैं। आप बस वह चाहते हैं अर्थात प्रशंसा के पुल । मुझे जो लगा लिख दिया । यदि ऐसा नहीं है तो किसी दलित के लिए कुछ करके दिखाइये।
@महक जी ! आप अनवर जी के ब्लाग पर आये तो आपको चन्द सवर्णों से परिचय हो गया , अगर आप किसी दलित के ब्लाग पर गये होते तो आपके दिव्य दृष्टि क्षेत्र में आज कुछ दलित भी जरूर होते। आप कह सकते हैं कि मैं किसी ब्लाग पर दलित सवर्ण देखकर नहीं जाता। चलिए मान लिया लेकिन मुद्दा देखकर तो जाते हैं क्या आपको किसी दलित चिंतक की बात में दम ही नजर न आया। आप के पास सब कुछ है । ब्लागिंग आपके लिए एक व्यसन है एक अय्याशी है। आप नेता न बन सके आप संसद में न जा सके तो आप ने एक आभासी संसद बना ली है। किसी वीडियो गेम की तरह खेलते रहिये इसे। क्षमा कीजिये मैं ठोस काम में यकीन करता हूं। कभी आपको निष्पक्ष और ठोस काम करते देखूंगा तो खुद आकर सम्मिलित हो जाउंगा। अभी तो यह मृग मरीचिका आपको और आपके जैसे पेट भरों को ही मुबारक हो। यह लेख मैं कल पोस्ट करता लेकिन नेट गड़बड़ा गया था। यह लेख आज भी प्रासंगिक है।

सत्य गौतम said...

आजतक पर आरएसएस के गुंडों का हमला
कल शाम करीब पांच बजे आरएसएस के गुंड़ों ने आजतक चैनल के दिल्ली दफ्तर पर हमला किया और भारी तोड़-फोड़ मचायी। हजारों की संख्या में वीडियोकॉन टावर के भीतर जबरदस्ती घुस आए इन गुंड़ों ने ग्राउंड फ्लोर पर करीने से सजे गमले,मेटल डिटेक्टर डोर और कैफे कॉफी डे को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया। चैनल की फुटेज देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी तैयारी के साथ हमले की नीयत से यहां पहुंचे थे। लेकिन इस हमले को लेकर आरएसएस प्रवक्ता राम माधव ने साफ कहा कि कोई हमला नहीं हुआ है। आजतक के संवाददाता बार-बार वीडियो फुटेज का हवाला देते रहे कि ये सब कैमरे में कैद है लेकिन माधव ने बस इतना कहा कि उत्साह में आकर थोड़ा-बहुत कुछ कर दिया होगा,इसके लिए भी जिम्मेवार आप ही लोग(आजतक) हैं लेकिन लोगों का इरादा हमला करना बिल्कुल भी नहीं था। अब सवाल है कि वन्दे मातरम का नारा लगानेवाले आरएसएस और उसके प्रवक्ता यदि झूठ बोलते हैं तो फिर आगे क्या किया जाए?
http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_17.html?showComment=1279374852583#c8035633282365064955

Anonymous said...

The Lawful, the Unlawful and what is doubtful.


On the authority of Al-Numan bin Basheer, who said : I heared the messenger of Allah say :

"That which is lawful is plain and that which is unlawful is plain and between the two of them are doubtful matters about which not many people know. Thus he who avoids doubtful matters clears himself in regard to his religion and his honor, but he who falls into doubtful matters falls into that which is unlawful, like the shepherd who pastures around a sanctuary, all but grazing therein. Truly every king has a sanctuary, and truly Allah's sanctuary is His prohibitions. Truly in the body there is a morsel of flesh which, if it be whole, all the body is whole and which, if it be diseased, all of it is diseased. Truly it is the heart."


Bukhari and Muslim



Many people judge Islam according to muslims actions, or some city, country rules, culture etc. it is an error to judge islam according to mecca (makkah) or madina city or arab countries, judge these countries or city according to Islam.

Anonymous said...

सत्या गौतम मै मुस्लिम हूँ और मेरे दलित भी मित्र है और सवर्ण भी और राजपूत भी, और मेने सभी को उनकी ज़रूरत और अपनी हैसियत के अनुसार समय समय पर मदद क़ी लेकिन दलित और राजपूत मित्रो को तो मैने नेक दिल साफ़ दिल वाला पाया जबकि सवर्ण ने अक्सर धोखा दिया और चालबाज़िया क़ी है

Anonymous said...

सत्या गौतम मै मुस्लिम हूँ और मेरे दलित भी मित्र है और सवर्ण भी और राजपूत भी, और मेने सभी को उनकी ज़रूरत और अपनी हैसियत के अनुसार समय समय पर मदद क़ी लेकिन दलित और राजपूत मित्रो को तो मैने नेक दिल साफ़ दिल वाला पाया जबकि सवर्ण ने अक्सर धोखा दिया और चालबाज़िया क़ी है पता नही ऐसा क्यो हुआ ? लेकिन ये बात दिमाग़ मे बैठने लगी क़ी क्या सारे सवर्ण ऐसे ही होते है ?

Dr. Ayaz ahmad said...

अच्छी पोस्ट

निर्मला कपिला said...

अच्छी जानकारी है आभार।