Sunday, May 22, 2011

भारत में लोकतन्त्र अलपसंख्यकों के लिए अभिशाप - Sharif Khan

जिस देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग रहते हों और जहां धर्मों और जातियों के आधार पर वर्गीकरण करके समाज को बांटा गया हो वहां लोकतन्त्र भीड़तन्त्र बन जाता है और बहुसंख्यक समाज निरंकुश होकर अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी करके उनके अधिकारों का हनन करने लगता है और इस प्रकार से लोकतन्त्र अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप बन जाता है। किसी शायर के द्वारा कहे गए यह शब्द अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच सम्बन्धों का इज़हार करने के लिए पर्याप्त हैं -

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हें बदनाम।
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।

हिन्दोस्तान में दुनिया के सबसे बड़े कहलाए जाने वाले लोकतन्त्र की भयावह तस्वीर दिखाने के लिए निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं -

1 - 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय पाकिस्तान रेडियो से समाचार सुनने पर रोक लगा दी गई थी जिसके नतीजे में पुलिस अपनी आदत के अनुसार किसी भी मुसलमान को केवल यह आक्षेप लगाकर प्रताड़ित करने से नहीं चूकती थी कि वह रेडियो पाकिस्तान से समाचार सुन रहा था चाहे वह दिल्ली से गाने ही सुन रहा हो जबकि हिन्दुओं को अक्सर रेडियो पाकिस्तान से सुने हुए समाचारों पर चर्चा करते हुए देखा जा सकता था।

2 - सन् 1984 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी का क़त्ल हुआ और चूंकि क़ातिल सिख (जोकि एक अल्पसंख्यक समुदाय है) थे इसलिए उसकी प्रतिक्रिया का बहाना बनाकर हज़ारों बेक़सूर सिखों का क़त्ले आम कराया गया। ध्यान रहे क़त्ले आम में औरतों, बच्चों और बूढ़ों को भी नहीं बख़्शा जाता। जबकि राष्ट्रपिता गांधी जी के क़त्ल की प्रतिक्रिया इस प्रकार की न हुई क्योंकि उस घटना में अपराधी बहुसंख्यक समाज से सन्बन्धित था।

श्रीमति इन्दिरा गांधी के क़त्ल से सम्बन्धित पूरे घटनाक्रम में अफ़सोसनाक पहलू यह है कि उनके क़त्ल के आरोपियों के ख़िलाफ़ अपराध सिद्ध होने पर अदालत द्वारा सज़ा भी सुना दी गई और सज़ा दे भी दी गई जबकि उसी दौरान किये गए सिखों के क़त्ले आम के ज़िम्मेदार अपराधियों को अभी तक चैथाई सदी गुज़रने पर भी सज़ा नहीं मिली है। क्या यह इसलिए है कि यह अपराधी बहुसंख्यक समाज से सम्बन्धित हैं जबकि इनके द्वारा पीड़ित अल्पसंख्यक थे।

3 - उड़ीसा के एक गांव में रात को अपनी गाड़ी में सो रहे फ़ादर ग्राह्म स्टेन्स नामक एक पादरी को उनके दो मासूम बच्चों के साथ ज़िन्दा जला दिये जाने की दिल दहला देने वाली घटना को सभी जानते हैं। इस घटना को अंजाम देने वाला दारा सिंह नाम का एक व्यक्ति ईसाई समाज के ख़िलाफ़ कार्यरत एक संस्था का संचालक था। भा.ज.पा. और बजरंग दल के नेताओं ने दारा सिंह को क्लीन चिट देकर ईसाईयों के प्रति नफ़रत और अपराधियों से लगाव की भावना को ज़ाहिर कर दिया। उच्च न्यायालय द्वारा दारा सिंह को सुनाई गई फांसी की सज़ा के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में की गई अपील में फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायधीश ने अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया क्योंकि न्यायधीश महोदय ने इस अपराध को दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का नहीं पाया। इस घटना में भी पिता के साथ ज़िन्दा जला दिये गए दो मासूम बच्चे अल्प संख्यक समाज से सम्बन्धित थे। यदि ज़िन्दा जलाए जाने वाले अल्प संख्यक समाज से न होकर बहुसंख्यक समाज से सम्बन्धित होते और जलाने वाले अपराधी बहुसंख्यक समाज से न होकर अल्पसंख्यक समाज से सम्बन्धित होते तो क्या तब भी यह अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी से बाहर ही होता?

4 - किसी शायर के द्वारा कही गई दो पंक्तियां देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समाज की स्थिति का आईना हैं -

एक दो ज़ख्म नहीं सारा बदन है छलनी।
दर्द बेचारा परेशां है किस कल उठे।।

बहुसंख्यक समाज, चाहे वह प्रशासन से सम्बन्धित हो अथवा राजनीति से या किसी भी क्षेत्र से हो, के द्वारा बाबरी मस्जिद को मन्दिर में पविर्तित करने की घिनौनी साज़िश पर अमल करके हमेशा के लिए मानसिक यातना का जो ज़ख्म मुसलमानों को दिया गया गया है वह तब तक रिसता रहेगा जब तक मस्जिद उसी स्थान पर दोबारा नहीं बना दी जाती चाहे सदियां क्यों न गुज़र जाएं। यह बात मज़लूमों की मानसिकता के अनुरूप है।

गुजरात में महीनों तक होने वाले मुसलमानों के क़त्लेआम और उसके ज़िम्मेदार व्यक्ति को नायक के रूप में महिमामण्डित किया जाना लोकतन्त्र की ही तो देन है। इसीलिए भारत में लोकतन्त्र अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप है।

9 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

हुज़ूर ! बन्दे ने आपका कलाम पढ़ा और फिर इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर देखा जाये तो जो भी व्यवस्था ग़लत होगी वह सबके लिए अभिशाप ही होगी. नुक्सान हमेशा कमज़ोर के हिस्से में आता है, सो यहाँ भी आ रहा है. चैन यहाँ बहुसंख्यकों को भी नहीं है. भट्टा पारसौल में जो ज़ुल्म हो रहा है उसके शिकार बहुसंख्यक खुद बन रहे हैं.
अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का नज़रिया छोड़कर हमें केवल लोगों के अन्दर सोये हुए ईमान और इंसाफ़ के जज़्बे को जगाना होगा, तब सब एक और नेक बन जायेंगे.
धन्यवाद एक उम्दा लेख के लिए.

http://ahsaskiparten.blogspot.com/

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Aasharyajanak Jaakariyan.

............
खुशहाली का विज्ञान!
ये है ब्लॉग का मनी सूत्र!

akhtar khan akela said...

sharif bhaia aapne to bdi shraafat se aaynaa dikhaa diyaa lekin sch kdvaa hotaa hai koi baat nhin hotaa hai to hone do hm sb aapke is sch ke saath hai bdhaai ho ..akhtar khan akela kota rajsthan

Sharif Khan said...

DR. ANWER JAMAL sahib!
आपने भट्टा पारसोल की मिसाल गलत दी है क्योंकि वह तो पुलिस के दो सिपाहियों की मौत के बदले में सरकार अपनी हिटलरी दिखा रही है. अल्पसंख्यकों के साथ किया जा रहा भेदभाव जगजाहिर है. आज सेकड़ों गावों में मस्जिदें यह कहकर नहीं बनाने दी जा रही हैं कि नई परंपरा शुरू नहीं होने दी जाएगी जबकि मंदिर पुलिस चौकियों और सार्वजानिक पार्कों तक में बनाए जा रहे हैं.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ji!
यह जानकारियां केवल आश्चर्यजनक नहीं हैं बल्कि खून के आंसू हैं.

akhtar khan akela sahib!
आपका मेरे लिए भैया कहना मेरे दिल में उतर गया क्योंकि मेरे छोटे भाई बहन ही मुझे यह संबोधन देते हैं आपका शुक्रिया.
आईने का कम सच दिखाना है न कि यह देखना कि वह कड़वा है या मीठा.

vaibhavgaumat said...

हा हा हा, ये तो एक बहुत बड़ा मजाक है की भारत में लोकतंत्र अल्पसंख्यको के लिए अभिशाप है | ताऊ जी मेरे ख्याल से शायद आपने जर्नलो की जगह अल्प्संक्यक तो नहीं लिख दिया ? क्योंकि किसी भी जगह अल्पसंख्यको को ही आरक्छन मिलता है चाहे वो पढाई का मामला हो या नौकरी का, हर जगह अल्पसंख्यक | आपने भी अधिकतर देखा होगा की अगर किसी ओ.बी.सी. व्यक्ति के ४५ % और जर्नल के ५० % नंबर है तो ४५ % vale व्यक्ति को ही किसी school, college और नौकरी में पहले लिया जाता है न की ५० % वाले व्यक्ति को ! आखिर क्यूँ ??? क्या अल्पसंख्यको को भागवान ने कुछ कम और सामान्य जाती को कुछ ज्यादा दिया है ?
ताऊ जी अब आप एक ब्लॉग लिखियेगा "भारत में आरक्छन सामान्य जाती के लिए खतरा"

Ahmed Raza said...

Vaibhav Ji, aapke comment hi bina jaankari ke kiya gaya comment hai, Aapke adhuri jaankari ke liye main bata doon ki Aarakshan JAATI pe milta hai na ki DHARM ke naam pe. Kya Alpsankhyako me Samanya jaati nahi hoti? zara pata kar lijiyega. Haan aapki jankari ke liye bata du ki ST/SC me muslim alpsakhyako ki koi jaatiyan nahi. Aapke anusaar agar alpsankhyak naukri, school college me hain to apni kaabiliyat ke dam pe na ki bahusankhyako ke khairaat pe.
Ek umda lekh Shareef Sahab, Mubarakbaad

Sharif Khan said...

Himmat afzai ka shukriya janab.

arif kamaal said...

apka ye laikh kabile tareef hai.par alpsankhyako ko is pareshani se nijat pane ke liye kya karna chahiyai.

Sharif Khan said...

alp sankhyakon ko ekjut hokar bahusankhyak ho jana chahiye taki bahusankhyak unke muqable mein alpmat mein reh jaayein.