Tuesday, May 31, 2011

वकील का पेशा और न्याय - Sharif Khan

सभ्यता के इस युग में न्याय प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार होना चहिए तथा सरकार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि ऐसी व्यवस्था क़ायम करे जिस से देश का कोई भी नागरिक न्याय से वन्चित न रहे और इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि न्याय आसानी से तथा बिना कुछ खर्च किये हासिल हो यदि न्याय प्राप्ति के लिए धन की आवश्यकता पड़ती हो तो वह न्याय ख़रीदने के समान है जोकि सभ्यता के नाम पर कलंक जैसा है।

हमारे देश की न्यायायिक व्यवस्था में न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी जटिल और ख़र्चीली बना दी गई है कि न्याय आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है। इसीलिये कहा जाता है कि ‘‘जब दो पक्षों में मुक़दमा चलता है तो हारने वाला तो हारता ही है परन्तु जीतने वाला भी फैसला आने तक इतना बरबाद हो चुका होता है कि वह भी हारने जैसा ही होता है।‘‘

एक छोटे से उदाहरण से बात आसानी से समझाई जा सकती है। एक कमज़ोर व्यक्ति के मकान पर कोई व्यक्ति यदि क़ब्जा कर ले तो पीड़ित को अदालत से न्याय पाने के लिए कोर्ट फीस के नाम पर अच्छी ख़ासी रक़म जमा करनी होती है, जोकि मकान की कीमत के अनुसार निश्चित होती है और यदि पीड़ित व्यक्ति किन्हीं कारणों से कम धन जमा करता है तो मुक़दमा दायर होने के बाद विपक्षी ऐतराज़ लगाता है कि कोर्ट फ़ीस कम जमा होने के कारण यह न्याय पाने का अधिकारी नहीं है। जबकि यह तो सरकार का कर्तव्य होना चाहिए कि पीड़ित को उसकी सम्पत्ति बिना किसी ख़र्चे के वापस दिलाए। इसी कारण प्रायः पीड़ित व्यक्ति धनाभाव के कारण सब्र करके बैठ रहता है जिसके नतीजे में अराजकता को बढ़ावा मिलता है।

न्याय प्राप्त करने के लिए चूंकि वकील की सेवाएं लेना अनिवार्य है अतः पूरी न्यायायिक प्रक्रिया में वकील की भूमिका विशेष महत्व रखती है। वकील का काम पीड़ित को न्याय दिलाना होना चाहिए परन्तु वकील अपने मुवक्किल से मिले हुए मेहनताने के बदले में उसको मुक़दमा जिताना ही अपना एकमात्र लक्ष्य मान लेता है चाहे वह दूसरे का हक़ ही क्यों न छीन रहा हो अथवा अपने द्वारा किए गए अपराध की सज़ा से बचने की कोशिश में हो। इसके नतीजे में मुक़दमे का फ़ैसला प्रायः न्याय पर आधारित न होकर वकील की क़ाबलियत पर निर्भर करता है। अक्सर यह भी देखा गया है कि सही हक़दार आमतौर पर न्यायालय पर भरोसा करते हुए मध्यम दर्जे के वकील की सेवाएं ले लेता है जबकि दूसरा पक्ष बड़े वकील की सेवाएं लेकर उसकी शातिराना चालों से मुक़दमा जीत जाता है। न्ययालय तो वकीलों की बहस के आधार पर ही फ़ैसला देता है लिहाज़ा सही फ़ैसला देने की नियत होने के बावजूद वकीलों की बहस के आधार पर न्यायधीश द्वारा ग़लत फ़ैसला हो जाता है। इसका अफ़सोसनाक पहलू यह है कि झूठी दलीलों पर आधारित मुक़दमा जीतने वाला वकील गर्व के साथ कहता है कि मैंने अमुक मुक़दमा झूठा होने के बावजूद जितवा दिया अथवा सरेआम क़त्ल करने वाले अपराधी को सज़ा होने से बचवा दिया या बलात्कारी को सज़ा से बचवाकर उल्टे पीड़िता के भाई को जेल की हवा खिलवा दी। आदि। इस से भी बुरी बात यह है कि झूठे मुक़दमे को जिताने वाले वकील की इज़्ज़त भी समाज में बढ़ जाती है यहां तक कि न्यायधीशों को भी अक्सर झूठा केस जिताने वासे वकीलों की तारीफ़ करते हुए देखा गया है। ध्यान रहे वकीलों में से ही जज भी बनाए जाते हैं।

बैरिस्ट्री पास करने के बाद गांधीजी ने जब राजकोट में वकालत शुरु की तो उनके पास कोई केस नहीं आया क्योंकि झूठा केस वह लेते नहीं थे और उनकी फ़ीस अधिक होने के कारण सच्चे केस के लिए कोई उनकी सेवाएं लेना नहीं चाहता था।

ध्यान रहे इस्लामी शासन व्यवस्था में वकील की कोई भूमिका नहीं होती क्योंकि दोनों पक्ष अदालत में पेश होकर अपनी बात कहते हैं जिसके आधार पर फ़ैसला दे दिया जाता है। तथा न्याय प्रप्त करने के लिए कोई ख़र्चा भी नहीं होता क्योंकि क़ानून व्यवस्था क़ायम करने के साथ न्याय भी मुफ़्त दिलाना सरकार का दायित्व है।

इंसान का ज़मीर ग़लत कार्य पर उसको टोकता है परन्तु आवेश में आकर ज़मीर की आवाज़ को नज़रअन्दाज़ करते हुए वह अपराध कर बैठता है। ऐसी भी मिसालें हैं किसी व्यक्ति द्वारा किये गए क़त्ल के जुर्म में किसी बेक़सूर को फांसी के तख्ते तक पहुंचने पर ज़मीर के धिक्कारने से अपराधी ने स्वयं हाज़िर होकर जुर्म कु़बूल कर लिया और बेक़सूर को अपने गुनाह के बदले में मिलने जा रही सज़ा से बचवा दिया। परन्तु इसमें मुख्य भूमिका निभाने वाले वकील के ज़मीर ने उसको कभी नहीं धिक्कारा। क्या इसलिए कि उसका ज़मीर मुर्दा हो चुका था।

17 comments:

akhtar khan akela said...

shrif bhai bhtrin soch hai vkilon ke liyen aedvocate act 1961 or baar council niymon me is mamle me vishesh pravdhan rakhe gaye hain bhtrin lekhan ke liyen bdhaai ..akhtr khan akela kota rajsthan

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

शरीफ खान जी,
आप का आलेख तथ्यों पर आधारित न हो कर धारणाओं पर आधारित है। फिर भी आपने वर्तमान न्याय व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान आधारित किया है। यह तथ्यपरक होता तो और अच्छा होता। मुस्लिम न्याय पद्धति की कुछ चीजें अच्छी हो सकती हैं लेकिन संपूर्ण मुस्लिम न्याय पद्धति को आज के जमाने में कोई भी उचित नहीं ठहरा सकता। स्वयं मुस्लिम आबादी का बहुसंख्य ही उसे पचाने में सक्षम नहीं है।

सत्य गौतम said...

आप किसी वकील के सताए हुए लगते हैं ?

वर्ना भारत में तो तुरंत न्याय मिलता है , बस यही कोई 60-70 वर्ष में ।

Anjana (Gudia) said...

‘‘जब दो पक्षों में मुक़दमा चलता है तो हारने वाला तो हारता ही है परन्तु जीतने वाला भी फैसला आने तक इतना बरबाद हो चुका होता है कि वह भी हारने जैसा ही होता है।‘‘

:-( sach hai...

Shah Nawaz said...

आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ... लेकिन वकील ना होने का कोई कारण ढूँढ नहीं पाया हूँ... आप कह रहे हैं कि शातिर वकील गलत केस भी जितवा देते हैं, यह स्थिति तो बिना वकील के भी जस कि तस ही रहेगी. क्योंकि अपराध अधिकतर शातिर प्रवत्ति के लोग ही करते हैं, और वह यहाँ भी इस लिहाज़ से फायदे में रहेंगे...

दूसरी बात यह कि कानूनी पहलुओं का ज्ञान रखना हर एक के बस की बात भी नहीं है. जिसे ज्ञान है, जिसने पढ़ाई की है, उसे ही तो वकील कहा जाता है.

चाहे वकील हो या आम इंसान, अगर अपने गुनाहों पर खुदा का डर उसके दिल में होगा, तब वह स्वयं ही गुनाह से डरेगा... वर्ना दुनिया की कोई ताकत उसे डराने में पूर्णत: सक्षम नहीं है...

Shah Nawaz said...

आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ... लेकिन वकील ना होने का कोई कारण ढूँढ नहीं पाया हूँ... आप कह रहे हैं कि शातिर वकील गलत केस भी जितवा देते हैं, यह स्थिति तो बिना वकील के भी जस कि तस ही रहेगी. क्योंकि अपराध अधिकतर शातिर प्रवत्ति के लोग ही करते हैं, और वह यहाँ भी इस लिहाज़ से फायदे में रहेंगे...

दूसरी बात यह कि कानूनी पहलुओं का ज्ञान रखना हर एक के बस की बात भी नहीं है. जिसे ज्ञान है, जिसने पढ़ाई की है, उसे ही तो वकील कहा जाता है.

चाहे वकील हो या आम इंसान, अगर अपने गुनाहों पर खुदा का डर उसके दिल में होगा, तब वह स्वयं ही गुनाह से डरेगा... वर्ना दुनिया की कोई ताकत उसे डराने में पूर्णत: सक्षम नहीं है...

HAKEEM SAUD ANWAR KHAN said...

@ शाहनवाज़ भाई साहब ! इसलामी न्याय प्रणाली में गवाहों को यह डर नहीं होता कि मुक़ददमा लंबा खिंचेगा और मुल्ज़िमान ज़मानत पर बाहर आकर हमें मार देंगे। लिहाज़ा लोग बेधड़क होकर गवाही और सुबूत देते हैं और मुजरिम को सज़ा हर हाल में होती है, चाहे वह कितना ही शातिर हो।

एस.एम.मासूम said...

शरीफ खान साहब आपने वर्तमान न्याय व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है और यकीनन इसमें हमेशा सुधार की आवश्यकता रहेगी. क्यूँ की इंसान के बनाये कानून और अल्लाह के बनाये कानून की तुलना संभव नहीं.

एस.एम.मासूम said...

दिनेशराय द्विवेदी जी आप ने कहा की "मुस्लिम न्याय पद्धति की कुछ चीजें अच्छी हो सकती हैं लेकिन संपूर्ण मुस्लिम न्याय पद्धति को आज के जमाने में कोई भी उचित नहीं ठहरा सकता। स्वयं मुस्लिम आबादी का बहुसंख्य ही उसे पचाने में सक्षम नहीं है।"
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यह सत्य नहीं है क्यूंकि हर मुस्लिम इस्लाम की न्याय पद्धति को मानता है और यदि कोई इस कानून को नहीं मानता तो वो मुस्लिम नहीं कहलाता. मुस्लिम केवल नाम रख लेने से नहीं हो जाता. उसको कुरान के कानून को मान ना और उस पे चलना होता है.

WASEEEM AHMED said...

Gahri haqiqat ka bayan hai yh post.
Masoom sahab se agree.

Kunwar Kusumesh said...

aapki baat men dam hai.

Sharif Khan said...

दिनेशराय द्विवेदी ji,
"वकील का काम पीड़ित को न्याय दिलाना होना चाहिए परन्तु वकील अपने मुवक्किल से मिले हुए मेहनताने के बदले में उसको मुक़दमा जिताना ही अपना एकमात्र लक्ष्य मान लेता है चाहे वह दूसरे का हक़ ही क्यों न छीन रहा हो अथवा अपने द्वारा किए गए अपराध की सज़ा से बचने की कोशिश में हो।"

वकीलों की उपरोक्त भूमिका के बारे में आपकी टिप्पणी निवेदित थी न की इस्लामी व्यवस्था पर. कृपया इस पर प्रकाश डालें.

Sharif Khan said...

Shah Nawaz ji,
आमतौर से अदालत में पक्षकार को अपनी बात कहने का मौक़ा नहीं मिलता है और वकील उसकी तरफ से बहस करता है जबकि होना यह चाहिए की अगर पक्षकार सही ढंग से अपनी बात न कह सके तो उसकी बात समझाने में सहायता के तौर पर वकील अपनी भूमिका निबाहे.

Sharif Khan said...

एस.एम.मासूम sahab,
जहाँ शिक्षा मुफ्त दिए जाने की योजनाओं पर अमल किया जा रहा है वहां इससे भी पहले ज़रुरत है मुफ्त न्याय मिलने की. सरकार का पहला कर्तव्य न्याय करना होता है और उसके लिए भी अगर धन खर्च करना पड़े तो यह स्वयं में एक अन्याय है.

Muhammad Ali said...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai द्विवेदी ................. यह तथ्यपरक होता तो और अच्छा होता।

जनाब दिवेदी जी का कमेन्ट सराहनीये है क्यूंकि एक वकील और कानूनी सलाहकार होने के नाते वो जो लिख सकते हैं उन्होंने वही लिखा है , अनुभव कम होने कि वजह से बड़े ही विनम्र शब्दों में अपनी बात का स्पष्टीकरण कर रहा हूँ..........
रोजाना बहुत सरे मुक़द्दमे और अदालती कार्यवाही देखने,.............. और बेगुनाहों को सजा और गुनाहगारो को पूरी छूट और आजादी, ............. और नियय्पलिका के रोजाना के एकतरफा फैसले,.........उच्च कोटि के वकील के द्वारा सिर्फ अपनी फीस के हिसाब से झूट को सच और सच को झूट में बदलने के हुनर को मद्दे नज़र रखते हुए ,..........................रोजाना के समाचारपत्र चीख चीख कर कह रहे हैं कि रोजाना इन काबिल वकील कि वजह से जिन्हें इन्साफ मिलने कि उम्मीद थी उन्हें नहीं मिल पा रहा है ,.................. इन्साफ के नाम पर वकील किस तरह अमीरों कि जेब में बैठकर इन्साफ के साथ खेल खेल रहे हैं ........................ के बाद भी अगर कोई ये कहे कि "यह तथ्यपरक होता तो और अच्छा होता " कुछ अटपटा सा मालूम होता है / मेरा ये मतलब बिलकुल न निकला जाए कि १०० फीसद वकील भ्रष्ट हैं बल्कि ९९ फीसद पर मेरी संतुष्टि है / हो सकता है श्री दिवेदी जी बचे हुए एक फीसद का हिस्सा हों .........

एक तथ्य ....
....
उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के एक गाँव बुराड़ी में एक ही परिवार के ७ या ८ सदस्य मौत के घात उतार दिए गए जिसमे कि मरने वालो में दूध पीता बच्चा भी शामिल था और कातिल के गुनाह को कुबूल करने के बाद भी आज भी कुछ योग्य वकील कातिल कि तरफ से उन्हें बचाने के लिए (अपने मेहनताने के बदले में जिसमे कि कई लाख रूपये डकार चुके हैं ) अदालत में बहस कर रहे हैं जबकि कातिल ने क़त्ल करने कि वजह को साफ़ बताते हुए इकबाल इ जुर्म किया था / और हमारे आदरनी न्यायधीश भी एस मामले कि सत्यता से वंचित नहीं लेकिन फिर भी सही फैसला सुनाने में अपने आपको असमर्थ सा महसूस कर रहे हैं/

दिवेदी जी का दूसरा विश्लेषण ....................................संपूर्ण मुस्लिम न्याय पद्धति को आज के जमाने में कोई भी उचित नहीं ठहरा सकता...................

इस बात को अगर कोई ऐसा व्यक्ति कहे जिसने इस्लामी कानून का सही अध्ययन किया हो तो बात समझ आती है लेकिन मुझे लगता है कि बिना अध्ययन के ये तर्क मुनासिब नहीं है /
मै खुद इस समय अरब देश मै हूँ और मेने यहाँ आने के बाद इस्लामी न्याय पद्दति को लागू होते हुए देखा है/ अच्छे और बुरे इंसान सभी जगह हैं / लोग बुरे हो सकते हैं लेकिन मुस्लिम न्याय पद्दति क्यूँ गलत नहीं हो सकती इसके कुछ उदहारण निम्नवत हैं ..............
१. मुस्लिम न्याय पद्दति मै दोनों पक्ष को अपनी बात कहने का पूरा अवसर मिलता है ...
२. यहाँ रह रहे लोग चाहे वो मुस्लिम हैं या गैर मुस्लिम ,उनकी सुरक्षा कि १०० फीसद ज़िम्मेदारी यहाँ की हुकुमत कि है/ यहाँ मै रात को अपनी फॅमिली के साथ २ बजे भी बहार निकल जाऊं तो मेरी सुरक्षा की १०० फीसद गारेंटी है और मै ही अगर अपने देश मै देर रात निकल जाऊं तो खुद मेरे मोहल्ले मै मेरी सुरक्षा की गारेंटी ख़त्म हो जाती हैं /(ये फर्क है मुस्लिम न्याय पद्दति और दूसरी पद्दति मै )
३. कोई क़त्ल हो जाने के बाद यहाँ वकीलों की जेब गर्म होने का कोई ओचित्य नहीं (याद रहे हमारे यहाँ वकील दोनों पक्ष की तरफ से मालामाल होते हैं और जिसका क़त्ल हुआ है उसके परिजनों को न्याय मिलेगा इसकी कोई गारेंटी भी नहीं है )
४. मुस्लिम न्याय पद्दति मै क़त्ल जैसा जुर्म सिद्ध होने के पश्चात ये बात अब क़त्ल हुए वियक्ति के परिजन और वारिसों पर निर्भर करती है की वो किया चाहते हैं , न की भ्रष्ट पुलिस और वकील पर / हालाँकि यहाँ भी पुलिस और वकील हैं लेकिन मुस्लिम न्याय पद्दति मै उनका काम सिर्फ न्याय स्थापित करना है न की खून चूसना/.

मै खुद एक ज़िम्मेदार भारतीय नागरिक हूँ लेकिन कुछ कमी अगर हमरे अन्दर या हमरे तंत्र मै है तो हमें चाहिए की हम उनको सही करने की कोशिश करें और उनको स्वीकार करें की वो कमियाँ हैं /

बातें तो बहुत की जा सकती हैं लेकिन मै नहीं चाहता की मेरा कमेन्ट फिर से एक ब्लॉग बन जाए /

निष्कर्ष - सम्पूर्ण मुस्लिम न्याय पद्दति/इस्लामी न्याय पद्दति ही एक मात्र उचित हल है/ इसे न्याय की द्रष्टि से देखा जाये न कि सांप्रदायिक भावना से , धन्यवाद ./

जनाब शरीफ खान साहब ने न्याय पालिका के एक मज़बूत स्तम्भ (वकीलों की भूमिका ) का सही सच बयां करके जो काम किया है वो काफी काबिले तारीफ है/ हमेशा सच का साथ दो और ज़ुल्म के खिलाफ मजबूती से सामना करो चाहे बात अपने ही खिलाफ क्यूँ न हो , ये भी इस्लामी कानून की शिक्षा का एक हिस्सा है /

Sharif Khan said...

Muhammad Ali ji,
दिनेशराय द्विवेदी जी के इस्लाम के बारे में विचार पूर्वाग्रह से ग्रसित लगते हें वह अगर इस्लाम के कानून को लागू होते हुए देख लें तो हकीक़त सामने आ जाएगी. इस्लामी कानून के लागू होने से सम्बंधित एक बात की मिसाल ही काफी है और वह यह है की इस्लामी कानून में चोरी की सजा हाथ काटना है लेकिन ये कानून तब तक लागू नहीं हो सकता जब तक कि उस देश की सरकार इस बात की गारंटी न ले कि कोई भी व्यक्ति भूखा न रहेगा.

vaibhavgaumat said...

नमस्कार ताऊ जी,
मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ की वकील का काम सिर्फ न्याय दिलाना है, लेकिन इसमें वकील का भी क्या कसूर, वकील का भी तो कर्त्तव्य है की वो अपना काम पूरी कुशलता से करे और वकील के पास जो भी व्यक्ति अपना केस लेकर आएगा उसे तो वाही काम मन लगा कर करना चाहिए चाहे वो काम गलत हो या फिर सही. अगर वकील सही गलत में फर्क करने लगा तो फिर उसका तो काम चलने से रहा और ऊपर से उस पर गरीबी नाम की बीमारी आ कर चुपक जाएगी जो मेरे ख्याल से कोई भी नहीं चाहता | और अगर कोई वकील किसी काम को लेने से मन कर देगा तो उसी वक्त दूसरा वकील उस काम को करने के लिए तैयार हो जायेगा | और वकील का काम सिर्फ अपने क्लाइंट को न्याय दिलाने का होता है न की दुसरे वकील के क्लाइंट को न्याय दिलाना | और रही बात न्याय दिलाने की तो यह काम तो नयायपालिका में बैठे न्यायधिशो का होता है न की वकील का |