जब कोई व्यक्ति स्वयं को अल्लाह की ग़ुलामी में समर्पित कर देता है तो उसको मुस्लिम कहते हैं। अल्लाह ने अपने ग़ुलामों की रहनुमाई के लिये क़ुरआन भेजा और उसको समझाने व उसके अनुसार जीवन गुज़ारकर दिखाने हेतु अपने दूत के रूप में हज़रत मुहममद सल्ल० को नबी बनाकर भेजा। नबी के द्वारा किये गए कार्यों को सुन्नत तथा उनके द्वारा कही गई बातों को हदीस कहते हैं लिहाज़ा हर मुसलमान इस बात के लिये बाध्य हो गया कि वह केवल क़ुरआन और हदीस के मुताबिक़ ही अपना जीवन गुज़ारे। अल्लाह की इबादत के लिये मस्जिद बनाई जाती है जिसके लिये जो नियम बनाए गए हैं उनके अनुसार यह आवश्यक है कि मस्जिद की जगह ख़रीदी गई हो या किसी मुसलमान द्वारा स्वेच्छा से दी गई हो अथवा सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई हो। किसी नाजाइज़ जगह पर बनाई गई मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती इसीलिए न तो पुलिस थानों में मस्जिद बनाने की मांग की जाती है न सार्वजनिक स्थलों को घेरकर और न ही पार्क आदि में मस्जिदों का निर्माण होता है।
चूंकि हर मुसलमान इन बातों के साथ इस बात से भी वाक़िफ़ है कि अवैध स्थान पर बनी हुई मस्जिद में पढ़ी गई नमाज़ अल्लाह के यहां क़ुबूल नहीं होती लिहाज़ा किसी मस्जिद में लगातार नमाज़ पढ़ा जाना ही मस्जिद की वैधता को साबित करने के लिये काफ़ी है। बाबरी मस्जिद में लगातार नमाज़ पढ़ी जाती रही परन्तु 22@23 दिसम्बर 1949 की रात में इशा की नमाज़ के बाद जब सब लोग चले गए तब मस्जिद के अन्दर मूर्ति रख दी गई और सुबह को जब फजर की अज़ान देने के लिये मुअजि़जन आया तो मस्जिद में मूर्ति देखकर इमाम साहब को इस बात की सूचना देने के लिये वापस लौट गया। इसके बाद इस बात की कोतवाली में एफ़.आई.आर. दर्ज कराई गई। इसके बाद के तथ्यों पर ग़ौर करके देखें तो भारत में लोकतन्त्र के चारों स्तम्भों के खोखलेपन का अन्दाज़ा आसानी से हो जाएगा।
1. यह कि, मस्जिद में मूर्ति रखे जाने की शिकायत को दूर करने का कार्य कोतवाल के अधिकार क्षेत्र में ही आता था लिहाज़ा यदि साज़िश के तहत यह कार्य न किया गया होता तो मस्जिद में से मूर्ति निकलवाकर मस्जिद को पाक करने में कोतवाल के सक्षम होने के बावजूद उसके द्वारा यह कार्य न किया जाना साज़िश साबित करता है।
2. यह कि, के.के. नैयर, जो उस समय वहां का डी.एम. था, ने वहां आकर इमाम साहब व दूसरे मुसलमानों से कहा कि दो तीन सप्ताह ठहर जाइये जांच करके मामले को सुलझा दिया जाएगा तब तक कोई मुसलमान मस्जिद से 100 मीटर दायरे के अन्दर न आए। इस प्रकार से मामले को उलझा दिया गया और इस घिनौने कार्य के बदले इनाम के तौर पर इसी डी.एम. को जनसंघ पार्टी से एम.पी. बनवाया गया। डी.एम. का इस साज़िश में शामिल होना मूर्ति रखने वाले महन्त रामसेवक दास के मीडिया के सामने दिये गए इस बयान से साबित हो जाता है कि ‘‘मुझसे तो मूर्ति रखने के लिये नैयर साहब ने कहा था।‘‘
3. यह कि, मामला तो केवल मूर्ति निकलवाने का था न कि मस्जिद की वैधता को साबित करना परन्तु सबके देखते देखते मस्जिद को ढांचा कहा जाने लगा और मन्दिर की दावेदारी को स्वीकृति देने की राह हमवार की जाने लगी।
4. यह कि, मस्जिद की जगह पर कराये जाने वाले मन्दिर निर्माण की साज़िश के सहयोगियों में अपना नाम दर्ज करवाने हेतु राजीव गांधी द्वारा मस्जिद का ताला खुलवा दिया गया। और बाक़ी काम भा.ज.पा. के लिये छोड़ दिया गया।
5. यह कि, ताला खुलने के बाद देश में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ जिसको सफल बनाने का बीड़ा भा.ज.पा. ने उठाया और उसके नेताओं ने इस काम को निहायत ईमानदारी से पूरा भी किया। मुसलमानों को आतंकित करने के लिये हर प्रकार के हथकण्डे अपनाए गए। एक नारा लगाया कि, ‘‘यह अन्दर की बात है प्रशासन हमारे साथ है‘‘ और प्रशासन ने पुलिस की सुरक्षा में इस प्रकार के नारे लगाते हुए जलूसों को आज़ादी से निकलवाया और मीडिया ने प्रचारित किया। लाल कृष्ण अडवानी ने रथ यात्रा निकाल कर पूरे देश के वातावरण को साम्प्रदायिकता की गन्दगी से दूषित कर दिया। ज़्यादा तफ़सील में जाने की ज़रूरत इसलिये नहीं है क्योंकि पूरा देश इसका गवाह है।
6. यह कि, चूंकि क़ानून हाथ में लेकर किसी इमारत को तोड़ डालने वाले को ग़ुण्डा कहते हैं इसलिये हम भी इस शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहते हैं कि दो लाख ग़ुण्डों ने इकट्ठा होकर मस्जिद को शहीद करके ताला खुलवाने के बाद राजीव गांधी द्वारा सौंपे गए काम को पूरा कर दिया और देश का प्रधानमन्त्री टी.वी. पर इस कार्रवाई को देखता रहा। उस समय के माहौल का अन्दाज़ा करने के लिये सिर्फ़ इतना कहना ही काफ़ी है कि देश में रह रहे 20 करोड़ मुसलमानों की मौजूदगी में यह घिनौना कार्य होना तब तक सन्भव नहीं था जब तक कि उनको आतंकित न कर दिया गया होता। इस पूरी कार्रवाई को अन्जाम देने में केन्द्रीय सरकार, प्रदेश सरकार व प्रशासन का पूरा सहयोग रहा।
इसके बाद के हालात भी सब जानते हैं कि भा.ज.पा. के द्वारा किये गए इस घिनौने कार्य के इनाम के रूप में उसकी केन्द्र में सरकार बनवाकर हमारे देश के आदर्शवादी कहलाए जाने वाले समाज ने आतंकवाद में अपनी आस्था भलीभांति साबित कर दी। न्यायालय में चल रहे मुक़दमे के दौरान एक पक्ष के यह कहने,‘‘अदालत का फ़ैसला कुछ भी हो मन्दिर यहीं बनेगा‘‘ में न्यायालय की अवमानना किसी को भी नज़र न आई।
पवित्र क़ुरआन के 72 वें अध्याय की 18 वीं आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है, अनुवाद, और यह मस्जिदें अल्लाह ही के लिए ख़ास हैं अतः इनमें अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो‘‘ इस प्रकार से चाहे तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमैटी हो या फिर कोई दूसरी संस्था हो, यदि वह मस्जिद जहां थी और जितनी थी उसी के मुताबिक़ उसको को दोबारा वहीं तामीर करा सकें तो ठीक है वरना इसके अतिरिक्त किसी भी प्रकार का समझौता करने का हक़ किसी को भी नहीं है। लिहाज़ा चाहे ज़बरदस्ती या किसी क़ानून का सहारा लेकर यदि मस्जिद के स्थान पर कुछ और तामीर हुआ तो मुसलमानों को चाहिए कि उसको तस्लीम न करके यह समझ कर धैर्य रखें कि देश में जहां बहुत से मुसलमानों को क़त्ल करके शहीद किया जा रहा है वहां मस्जिद भी शहीद कर दी गई।
Friday, July 30, 2010
Tuesday, July 27, 2010
swarg nark स्वर्ग और नर्क sharif khan
एक सज्जन अमेरिका में रहने वाले अपने बड़े भाई से मिलकर लौटे हैं और आजकल जहां भी जाते हैं यही चाहते हैं कि लोगों को अपने संस्मरण सुनाकर गौरवान्वित होते रहें। वहां का गुणगान वह कुछ इस अन्दाज़ में करते हैं जैसे कि स्वर्ग से लौटकर आये हों और नर्कवासियों को वहां के हालात से परिचित करा रहे हों। कुछ दोस्तों की एक महफ़िल में यह सज्जन मिले और वार्तालाप को अपने कब्जे में लेते हुए कहने लगे कि अगर स्वर्ग देखना है तो अमेरिका देख लो। उनके बात आगे बढ़ाने पहले ही मैंने कहा कि यदि नर्क देखना है तो अमेरिका को देख लो। जैसा मैं चाहता था, उसी के अनुसार प्रभाव पड़ा तथा लोग मेरी ओर आकर्षित होकर मेरी बात सुनने आमादा हो गए जो इस प्रकार थी।
हमारे पूर्वजों ने हज़ारों वर्षों में जिस प्रकार के समाज का निर्माण किया उसकी बुनियाद है वैवाहिक व्यवस्था। हमारे समाज ने बिना विवाह किये हुए किसी महिला के परपुरुष के साथ रहने को अथवा सम्बन्ध बनाने को कभी मान्यता नहीं दी तथा इस कार्य को व्याभिचार कहा गया है। इस प्रकार के सम्बन्ध बनाने वाले लोगों को सदैव ही धिक्कारा गया है तथा ऐसी महिलाओं को रखैल व इस सम्बन्ध के नतीजे में जन्मे बच्चों के लिये हरामी शब्दों का प्रयोग किया जाता है तथा इन शब्दों को गालियों के रूप में इस्तेमाल किया जाना ही यह साबित करने के लिये काफ़ी है कि सभ्य समाज में यह बात नाक़ाबिले माफ़ी अपराध है।
इस प्रकार के शब्दों का अपनी भाषा में प्रयोग मुझे शर्मसार कर रहा है जिसके लिये मैं क्षमा प्रार्थी हूं।
अमेरिकी सामाजिक परिवेश पर यदि नज़र डाली जाए तो हम देखते हैं कि वहां आधे से ज़्यादा युवतियां शादी से पहले मां बन जाती हैं और उसके बाद तय किया जाता है कि विवाह किया जाए या ऐसे ही साथ रहते रहें और यदि विवाह करना हो तो क्या बच्चों के बाप से किया जाए अथवा किसी दूसरे व्यक्ति से। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक बात यह है कि वहां के समाज ने इसे मान्यता दी हुई है। ऐसे घिनौने समाज का गुणगान करते हुए उसकी स्वर्ग से उपमा देने वाले सज्जन की बात के जवाब में यदि उसको नर्क कहा जाए तो किसी भी प्रकार से अनुचित न होगा।
हमारे देश में गर्ल फ्रेण्ड व बॉय फ्रेण्ड का चलन तो टी.वी. और फ़िल्मों के माध्यम से आरम्भ होकर व्याभिचार के द्वार खोल ही चुका है और दूसरी ओर लोकतन्त्र के चारों स्तम्भों विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा मीडिया में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो इस कार्य को क़ानून की सहायता से आगे बढ़ाते हुए अमेरिका के मानिन्द हमारे समाज का भी जनाज़ा निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं।
ब्लॉगर बिरादरी से मेरा अनुरोध है कि यदि समाज को पतन की राह पर जाते हुए महसूस कर रहे हैं तो, बजाय ख़ामोश तमाशाई बनने के, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझें और सारे भेदभाव भुलाकर इस मुद्दे को एक कॉमन प्रोग्राम की तरह से उठाने की कार्ययोजना तैयार करने में सहयोग करें वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारा प्यारा देश भी अमेरिका की तरह से रखैलों और हरामी बच्चों के देश के रूप में पहचाना जाने लगेगा।
हमारे पूर्वजों ने हज़ारों वर्षों में जिस प्रकार के समाज का निर्माण किया उसकी बुनियाद है वैवाहिक व्यवस्था। हमारे समाज ने बिना विवाह किये हुए किसी महिला के परपुरुष के साथ रहने को अथवा सम्बन्ध बनाने को कभी मान्यता नहीं दी तथा इस कार्य को व्याभिचार कहा गया है। इस प्रकार के सम्बन्ध बनाने वाले लोगों को सदैव ही धिक्कारा गया है तथा ऐसी महिलाओं को रखैल व इस सम्बन्ध के नतीजे में जन्मे बच्चों के लिये हरामी शब्दों का प्रयोग किया जाता है तथा इन शब्दों को गालियों के रूप में इस्तेमाल किया जाना ही यह साबित करने के लिये काफ़ी है कि सभ्य समाज में यह बात नाक़ाबिले माफ़ी अपराध है।
इस प्रकार के शब्दों का अपनी भाषा में प्रयोग मुझे शर्मसार कर रहा है जिसके लिये मैं क्षमा प्रार्थी हूं।
अमेरिकी सामाजिक परिवेश पर यदि नज़र डाली जाए तो हम देखते हैं कि वहां आधे से ज़्यादा युवतियां शादी से पहले मां बन जाती हैं और उसके बाद तय किया जाता है कि विवाह किया जाए या ऐसे ही साथ रहते रहें और यदि विवाह करना हो तो क्या बच्चों के बाप से किया जाए अथवा किसी दूसरे व्यक्ति से। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक बात यह है कि वहां के समाज ने इसे मान्यता दी हुई है। ऐसे घिनौने समाज का गुणगान करते हुए उसकी स्वर्ग से उपमा देने वाले सज्जन की बात के जवाब में यदि उसको नर्क कहा जाए तो किसी भी प्रकार से अनुचित न होगा।
हमारे देश में गर्ल फ्रेण्ड व बॉय फ्रेण्ड का चलन तो टी.वी. और फ़िल्मों के माध्यम से आरम्भ होकर व्याभिचार के द्वार खोल ही चुका है और दूसरी ओर लोकतन्त्र के चारों स्तम्भों विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा मीडिया में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो इस कार्य को क़ानून की सहायता से आगे बढ़ाते हुए अमेरिका के मानिन्द हमारे समाज का भी जनाज़ा निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं।
ब्लॉगर बिरादरी से मेरा अनुरोध है कि यदि समाज को पतन की राह पर जाते हुए महसूस कर रहे हैं तो, बजाय ख़ामोश तमाशाई बनने के, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझें और सारे भेदभाव भुलाकर इस मुद्दे को एक कॉमन प्रोग्राम की तरह से उठाने की कार्ययोजना तैयार करने में सहयोग करें वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारा प्यारा देश भी अमेरिका की तरह से रखैलों और हरामी बच्चों के देश के रूप में पहचाना जाने लगेगा।
Saturday, July 24, 2010
poverty and its solution भूख और उसका समाधान sharif khan
महाभारत का युद्ध समाप्त होने के पश्चात् कौरवों की मां गान्धारी अपने सभी सौ पुत्रों के मारे जाने के समाचार से आहत होकर युद्ध क्षेत्र का अवलोकन करने पहुंची और जब अपने एक पुत्र के शव को पड़े देखा तो बिलखकर रोने लगी। इस मन्ज़र को देखकर वहां उपस्थित लोगों के हृदय भी द्रवित हो गए परन्तु इसके पश्चात् जब उसका एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे शव से लिपटकर रोने का क्रम जारी हुआ तो इस हृदय विदारक दृश्य ने सभी उपस्थित जनों को विचलित कर दिया। वहां उपस्थित लोगों के आग्रह पर श्री कृष्ण ने इस शोकपूर्ण वातावरण को बदलने का उपाय इस प्रकार से किया कि गान्धारी को भूख का एहसास करा दिया। इस प्रकार वह भूख से इतनी विचलित हुई कि अपने पुत्रों की मृत्यु के दुःख को भूलकर पेट की भूख मिटाने का उपाय सोचने लगी। चारों ओर नजर दौड़ाने पर एक बेरी का वृक्ष दिखाई पड़ा जिसपर एक बेर लगा हुआ था। अपनी क्षुधापूर्ति हेतु गान्धारी ने उस बेर को तोड़ने का प्रयास किया परन्तु वहां तक हाथ न पहुंच पाया। हाथ बेर तक पहुंचे, इसके लिए जो तरकीब अपनाई गई उसका वर्णन रोंगटे खड़े करने देने वाला तो है ही साथ ही उससे यह भी ज़ाहिर होता है कि भूख से जो पीड़ा उत्पन्न होती है वह सारे दुःखों पर भारी है। वर्णन कुछ इस प्रकार है
जब बेर तोड़ने के लिये गान्धारी का हाथ वहां तक नहीं पहुंच पाया तो नीचे ज़मीन पर पड़े हुए अपने एक पुत्र के शव को पेड़ के नीचे तक खींच कर लाई और उस पर चढ़कर प्रयास किया परन्तु हाथ फिर भी बेर तक न पहुंच पाया। फिर दूसरे पुत्र का शव खींच कर लाई और उसको पहले पुत्र के शव के ऊपर रखा परन्तु फिर भी सफल न हो पाई। चूंकि वहां आस पास उसी के पुत्रों के शव पड़े थे इसलिये वह उन्हीं को एक के बाद एक लाती रही और बेर तोड़ने का प्रयास करती रही। इस दिल हिला देने वाली घटना के बाद भूख को गान्धारी ने इस प्रकार से बयान किया है
वसुदेव जरा कष्टम् कष्टम दरिद्र जीवनम्।
पुत्रशोक महाकष्टम् कष्टातिकष्टम परमाक्षुधा।।
अर्थात् हे कृष्ण! बुढ़ापा स्वयं में एक कष्ट है। ग़रीबी उससे भी बड़ा कष्ट है। पुत्र का शोक महा कष्ट है परन्तु इन्तहा दर्जे की भूख सारे कष्टों से भी बड़ा कष्ट है। ध्यान रहे गान्धारी ने स्वयं यह सारे कष्ट झेले थे।
हज़रत उमर (रजि०) ने ख़लीफ़ा बनने के बाद यह फ़रमाया था कि अगर एक बकरी भी भूख से मरती है तो उसका ज़िम्मेदार मैं होऊंगा। शायद इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर देश के आज़ाद होने के बाद गांधीजी ने आम सभा में फ़रमाया था कि मैं हिन्दोस्तान में हज़रत उमर जैसी शासन व्यवस्था चाहता हूं। असहनीय भूख तो कष्टकारी होती ही है। आप कल्पना करके देखिये कि भूख से जो मौतें होती हैं वह कितनी पीड़ादायक होती होंगी। शायद पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों से भी ज़्यादा भयानक होती हों।
हमारे देश के विधायक और सांसद यदि देश सेवा का संकल्प लेकर राजनीति में आए हैं तो एक साधारण क्लर्क के बराबर वेतन के बदले देश सेवा करें। इस प्रकार से उनको मिलने वाले वेतन व भत्ते आदि से होने वाली बचत ही इतनी हो जाएगी कि उसको यदि ग़रीबों पर ख़र्च किया गया तो हमारे देश से भूख के विदा होने में देर नहीं लगेगी।
जब बेर तोड़ने के लिये गान्धारी का हाथ वहां तक नहीं पहुंच पाया तो नीचे ज़मीन पर पड़े हुए अपने एक पुत्र के शव को पेड़ के नीचे तक खींच कर लाई और उस पर चढ़कर प्रयास किया परन्तु हाथ फिर भी बेर तक न पहुंच पाया। फिर दूसरे पुत्र का शव खींच कर लाई और उसको पहले पुत्र के शव के ऊपर रखा परन्तु फिर भी सफल न हो पाई। चूंकि वहां आस पास उसी के पुत्रों के शव पड़े थे इसलिये वह उन्हीं को एक के बाद एक लाती रही और बेर तोड़ने का प्रयास करती रही। इस दिल हिला देने वाली घटना के बाद भूख को गान्धारी ने इस प्रकार से बयान किया है
वसुदेव जरा कष्टम् कष्टम दरिद्र जीवनम्।
पुत्रशोक महाकष्टम् कष्टातिकष्टम परमाक्षुधा।।
अर्थात् हे कृष्ण! बुढ़ापा स्वयं में एक कष्ट है। ग़रीबी उससे भी बड़ा कष्ट है। पुत्र का शोक महा कष्ट है परन्तु इन्तहा दर्जे की भूख सारे कष्टों से भी बड़ा कष्ट है। ध्यान रहे गान्धारी ने स्वयं यह सारे कष्ट झेले थे।
हज़रत उमर (रजि०) ने ख़लीफ़ा बनने के बाद यह फ़रमाया था कि अगर एक बकरी भी भूख से मरती है तो उसका ज़िम्मेदार मैं होऊंगा। शायद इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर देश के आज़ाद होने के बाद गांधीजी ने आम सभा में फ़रमाया था कि मैं हिन्दोस्तान में हज़रत उमर जैसी शासन व्यवस्था चाहता हूं। असहनीय भूख तो कष्टकारी होती ही है। आप कल्पना करके देखिये कि भूख से जो मौतें होती हैं वह कितनी पीड़ादायक होती होंगी। शायद पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों से भी ज़्यादा भयानक होती हों।
हमारे देश के विधायक और सांसद यदि देश सेवा का संकल्प लेकर राजनीति में आए हैं तो एक साधारण क्लर्क के बराबर वेतन के बदले देश सेवा करें। इस प्रकार से उनको मिलने वाले वेतन व भत्ते आदि से होने वाली बचत ही इतनी हो जाएगी कि उसको यदि ग़रीबों पर ख़र्च किया गया तो हमारे देश से भूख के विदा होने में देर नहीं लगेगी।
Wednesday, July 21, 2010
muslims and media भारत में मुसलमानों की छवि और मीडिया का चरित्र sharif khan
भारत आबादी के ऐतबार से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं मीडिया (पत्रकारिता) लोकतन्त्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं। आज के युग में चतुर्थ स्तम्भ (मीडिया) का तो प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक महत्त्व हो गया है कि इसके बिना देश का लोकतान्त्रिक ढांचा क़ायम रह पाना असम्भव प्रतीत होता है। समाचार पत्र व पत्रिकाएं उन खिड़कियों के समान है जिनके द्वारा देश की आन्तरिक स्थिति का बाहर से तथा वाह्य स्थिति का अन्दर से अवलोकन किया जा सकता है तथा यदि मीडिया को देश की आंखें व कान कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। अतः मीडिया रूपी आंखों व कानों का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। जिस प्रकार बीमार आंखों से कभी एक के दो दिखाई देते हैं और कभी सब कुछ अस्पष्ट दिखाई देता है तथा रोगग्रस्त कानों से सत्यता का ज्ञान होना कठिन है उसी प्रकार यदि मीडिया निर्भीक, निष्पक्ष तथा स्पष्टवादी न होकर पूर्वाग्रह जैसे रोग से ग्रसित हो तो उसके द्वारा समाज की विचारधारा को ग़लत राह पर मोड़ दिये जाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
देश के स्वतन्त्रता संग्राम में भारत की पत्रकारिता ने जो शानदार भूमिका निभाई वह सर्वविदित है। स्वतन्त्रता सेनानियों के दिलों में देशभक्ति की भावना जागृत करने तथा आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर देने की लालसा पैदा करने में मीडिया की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार यदि मीडिया गुजरात के जंगल राज से देश की जनता को अवगत न कराती तो वहां मुसलमानों के ऊपर किये गए ज़ुल्म, लूट व हज़ारों लोगों के क़त्ल से दुनिया के लोग अनभिज्ञ ही रहते। 1984 में प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों पर जो अत्याचार हुए तथा हज़ारों बेकसूर सिखों की हत्या कर दी गई, इसका जिस निर्भीकता और निष्पक्षता से वर्णन किया गया उसके लिए मीडिया निःसंकोच तारीफ़ के क़ाबिल है। इसी प्रकार चाहे नेताओं के द्वारा किये गए घोटाले हों, भ्रष्टाचारियों के काले करतूत हों अथवा पुलिस की हैवानियत के मानवता को कलंकित करने वाले कारनामे हों, आदि के बारे में जनता को भलीभांति परिचित कराने का श्रेय मीडिया को ही जाता है।
मीडिया से जुड़े हुए व्यक्तियों का खोजी स्वभाव का होना तो आवश्यक है ही परन्तु इसके साथ यदि उनमें सत्यता, निष्पक्षता तथा निर्भीकता के गुण नहीं हैं तो उसका नतीजा बहुत बुरा निकलता है। अफ़सोस की बात यह है कि पिछले कुछ समय से कुछ ऐसे तत्वों का मीडिया में प्रवेश होता जा रहा है जिनमें सत्यता को जानने और निष्पक्षता से कार्य करने की भावना का अभाव है। बल्कि यह कहना अनुचित न होगा कि इस प्रकार के व्यक्ति हर घटना को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने के आदी हो गए है। और ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यतः मुसलमानों के खिलाफ़ तो एक संगठित अभियान के रूप में इस षडयन्त्र पर कार्य किया जा रहा है।
अब कुछ ऐसे संगठन पैदा हो गए हैं जिनका मकसद देश में साम्प्रदायिकता फैलाकर आपसी भाईचारे को समाप्त करना है चाहे इस कार्य के लिए उनको कितना ही घिनौना कार्य करना पड़े। समाज को हिन्दू और ग़ैर-हिन्दू दो भागों में बांटने की नापाक कोशिश की जा रही है। ऐसे अराजक तत्वों ने गैर-हिन्दुओं (मुसलमान, ईसाई आदि) के अधिकारों का हनन ही हिन्दुत्व की परिभाषा मान लिया है। इसी मानसिकता के लोगों का वर्चस्व होने के कारण उनके इस कार्य में मीडिया भी बराबर की भागीदार प्रतीत होती है। देशहित के विरुद्ध किये जा रहे इस घृणित कार्य के इतनी त्वरित गति से होने के पीछे पुलिस का सहयोग भी अपने स्थान पर विशेष महत्त्व रखता है।
ग़ैर-हिन्दुओं में मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है जिसकी छवि को धूमिल करने की ज़िम्मेदारी मीडिया ने अपने ऊपर ले रखी है जिसको वह बड़ी तत्परता से निभा रही है। देश में कहीं भी कोई आतंकवादी घटना यदि घटती है तो उसकी ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर थोप दी जाती है। पुलिस फर्जी मुठभेड़ दिखाकर कुछ बेक़सूर मुसलमानों को मार देती है और कुछ को फ़रार दिखाकर कुछ और बेक़सूरों को मारने के लिए रास्ता खोले रखती है। यदि मीडिया ऐसे मामलों में निष्पक्षता से काम ले तो पुलिस के क्रूर हाथों से बेक़सूर मुसलिम नौजवान न मारे जाएं। मीडिया की मुसलमानों के प्रति दुर्भावना को सिद्ध करने के लिए बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं।
यह मीडिया का ही कमाल है कि अबुल बशर नाम के एक ऐसे आलिम को, जो मोबाइल का प्रयोग तो दूर साइकिल तक चलाना तक न जानता हो, को तो आतंकवादियों के मास्टर माइण्ड के रूप में जनता के सामने पेश किया गया तथा इण्टरनेट का प्रयोग करने वाली, मोटरसाइकिल आदि चलाने वाली, बात बात में मुसलमानों के खिलाफ़ विषवमन करने वाली और रिवाल्वर से लेकर ए.के. 47 तक का प्रयोग करना जानने वाली प्रज्ञा सिंह को साध्वी के रूप में महिमामण्डित किये जाने में तनिक भी संकोच न किया गया।
सबसे ज्यादा अफ़सोसनाक बात यह है कि आर. एस. एस. के हिन्दुत्व वाली विचारधारा के लोगों की जो पौध तैयार की गई थी उसने अब परिपक्व होकर लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल में तथा कुछ हद तक मीडिया में अपनी जड़ें जमा ली हैं जिसके नतीजे में देश की आज़ादी में हज़ारों जानें क़ुर्बान करने वाले मुस्लिम समाज को आतंकवादी दल का रूप देकर कलंकित करने में तनिक भी संकोच नहीं किया जाता है।
मुसलमानों की छवि धूमिल करने के इस अभियान में मीडिया काफी हद तक सफल रही है जिसके परिणामस्वरूप मुसलमानों को आतंक का पर्याय बना दिया गया है जोकि देशहित के पूर्ण रूप से खिलाफ़ है।
देश के स्वतन्त्रता संग्राम में भारत की पत्रकारिता ने जो शानदार भूमिका निभाई वह सर्वविदित है। स्वतन्त्रता सेनानियों के दिलों में देशभक्ति की भावना जागृत करने तथा आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर देने की लालसा पैदा करने में मीडिया की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार यदि मीडिया गुजरात के जंगल राज से देश की जनता को अवगत न कराती तो वहां मुसलमानों के ऊपर किये गए ज़ुल्म, लूट व हज़ारों लोगों के क़त्ल से दुनिया के लोग अनभिज्ञ ही रहते। 1984 में प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों पर जो अत्याचार हुए तथा हज़ारों बेकसूर सिखों की हत्या कर दी गई, इसका जिस निर्भीकता और निष्पक्षता से वर्णन किया गया उसके लिए मीडिया निःसंकोच तारीफ़ के क़ाबिल है। इसी प्रकार चाहे नेताओं के द्वारा किये गए घोटाले हों, भ्रष्टाचारियों के काले करतूत हों अथवा पुलिस की हैवानियत के मानवता को कलंकित करने वाले कारनामे हों, आदि के बारे में जनता को भलीभांति परिचित कराने का श्रेय मीडिया को ही जाता है।
मीडिया से जुड़े हुए व्यक्तियों का खोजी स्वभाव का होना तो आवश्यक है ही परन्तु इसके साथ यदि उनमें सत्यता, निष्पक्षता तथा निर्भीकता के गुण नहीं हैं तो उसका नतीजा बहुत बुरा निकलता है। अफ़सोस की बात यह है कि पिछले कुछ समय से कुछ ऐसे तत्वों का मीडिया में प्रवेश होता जा रहा है जिनमें सत्यता को जानने और निष्पक्षता से कार्य करने की भावना का अभाव है। बल्कि यह कहना अनुचित न होगा कि इस प्रकार के व्यक्ति हर घटना को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने के आदी हो गए है। और ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यतः मुसलमानों के खिलाफ़ तो एक संगठित अभियान के रूप में इस षडयन्त्र पर कार्य किया जा रहा है।
अब कुछ ऐसे संगठन पैदा हो गए हैं जिनका मकसद देश में साम्प्रदायिकता फैलाकर आपसी भाईचारे को समाप्त करना है चाहे इस कार्य के लिए उनको कितना ही घिनौना कार्य करना पड़े। समाज को हिन्दू और ग़ैर-हिन्दू दो भागों में बांटने की नापाक कोशिश की जा रही है। ऐसे अराजक तत्वों ने गैर-हिन्दुओं (मुसलमान, ईसाई आदि) के अधिकारों का हनन ही हिन्दुत्व की परिभाषा मान लिया है। इसी मानसिकता के लोगों का वर्चस्व होने के कारण उनके इस कार्य में मीडिया भी बराबर की भागीदार प्रतीत होती है। देशहित के विरुद्ध किये जा रहे इस घृणित कार्य के इतनी त्वरित गति से होने के पीछे पुलिस का सहयोग भी अपने स्थान पर विशेष महत्त्व रखता है।
ग़ैर-हिन्दुओं में मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है जिसकी छवि को धूमिल करने की ज़िम्मेदारी मीडिया ने अपने ऊपर ले रखी है जिसको वह बड़ी तत्परता से निभा रही है। देश में कहीं भी कोई आतंकवादी घटना यदि घटती है तो उसकी ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर थोप दी जाती है। पुलिस फर्जी मुठभेड़ दिखाकर कुछ बेक़सूर मुसलमानों को मार देती है और कुछ को फ़रार दिखाकर कुछ और बेक़सूरों को मारने के लिए रास्ता खोले रखती है। यदि मीडिया ऐसे मामलों में निष्पक्षता से काम ले तो पुलिस के क्रूर हाथों से बेक़सूर मुसलिम नौजवान न मारे जाएं। मीडिया की मुसलमानों के प्रति दुर्भावना को सिद्ध करने के लिए बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं।
यह मीडिया का ही कमाल है कि अबुल बशर नाम के एक ऐसे आलिम को, जो मोबाइल का प्रयोग तो दूर साइकिल तक चलाना तक न जानता हो, को तो आतंकवादियों के मास्टर माइण्ड के रूप में जनता के सामने पेश किया गया तथा इण्टरनेट का प्रयोग करने वाली, मोटरसाइकिल आदि चलाने वाली, बात बात में मुसलमानों के खिलाफ़ विषवमन करने वाली और रिवाल्वर से लेकर ए.के. 47 तक का प्रयोग करना जानने वाली प्रज्ञा सिंह को साध्वी के रूप में महिमामण्डित किये जाने में तनिक भी संकोच न किया गया।
सबसे ज्यादा अफ़सोसनाक बात यह है कि आर. एस. एस. के हिन्दुत्व वाली विचारधारा के लोगों की जो पौध तैयार की गई थी उसने अब परिपक्व होकर लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल में तथा कुछ हद तक मीडिया में अपनी जड़ें जमा ली हैं जिसके नतीजे में देश की आज़ादी में हज़ारों जानें क़ुर्बान करने वाले मुस्लिम समाज को आतंकवादी दल का रूप देकर कलंकित करने में तनिक भी संकोच नहीं किया जाता है।
मुसलमानों की छवि धूमिल करने के इस अभियान में मीडिया काफी हद तक सफल रही है जिसके परिणामस्वरूप मुसलमानों को आतंक का पर्याय बना दिया गया है जोकि देशहित के पूर्ण रूप से खिलाफ़ है।
Tuesday, July 20, 2010
कटु सत्य sharif khan
अरबी भाषा का एक शब्द है ‘उलू‘ जिसका अर्थ है बुलन्दी, ऊंचाई, महानता।
इसी प्रकार से एक शब्द है ‘दुनू‘ जिसका अर्थ है पस्ती, गिरावट, निम्नता।
उलू से बना आला जिसका अर्थ हुआ महान या ऊंचा
और दुनू से बना अदना जिसका अर्थ हुआ निम्न या नीचा।
आला शब्द का स्त्रीलिंग होता है उलिया।
अतः जिस प्रकार से हम किसी महापुरुष के लिये कहते हैं आला हज़रत .....
उसी प्रकार से किसी महान महिला के लिये कहेंगे उलिया हतज़रत ........
इसी के अनुसार अदना शब्द का स्त्रीलिंग होता है दुनिया अर्थात् निम्नतम श्रेणी से सम्बन्धित चीज़ के लिये दुनिया शब्द बनता है।
अल्लाह ने पूरी कायनात (ब्रह्माण्ड) में सबसे बेहतर (आला) इन्सान को बनाया है। और उसको निम्नतम श्रेणी से सम्बन्धित स्थान अर्थात् दुनिया में भेजा। इसके साथ ही अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए दुनिया से विदा होने पर मनुष्य की जो स्थिति होती है उसको उदाहरण के तौर पर समझाने हेतु हम कह सकते हें कि सफ़ेद कपड़े पहनाकर यदि कुछ लोगों को कोयलों की कोठरी में से होकर गुज़ारने के बाद उनका अवलोकन करें तो हम देखेंगे कि किसी व्यक्ति के कपड़ों पर कम दाग़ होंगे, किसी के कपडों पर अधिक होंगे, कुछ के कपड़े ऐसे होंगे कि रंग का पता ही न चलेगा और उनमें जो उत्तम श्रेणी के लोग होंगे उनके कपड़ों पर कोई दाग़ न होगा और वही कामयाब कहलाने के हक़दार होंगे। इन्हीं सब बातों को ध्यान नें रखते हुए हमको अपने जीवन का मक़सद समझना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि इस दुनिया से विदा होते समय हमारा दामन दाग़दार न हो।
इसी प्रकार से एक शब्द है ‘दुनू‘ जिसका अर्थ है पस्ती, गिरावट, निम्नता।
उलू से बना आला जिसका अर्थ हुआ महान या ऊंचा
और दुनू से बना अदना जिसका अर्थ हुआ निम्न या नीचा।
आला शब्द का स्त्रीलिंग होता है उलिया।
अतः जिस प्रकार से हम किसी महापुरुष के लिये कहते हैं आला हज़रत .....
उसी प्रकार से किसी महान महिला के लिये कहेंगे उलिया हतज़रत ........
इसी के अनुसार अदना शब्द का स्त्रीलिंग होता है दुनिया अर्थात् निम्नतम श्रेणी से सम्बन्धित चीज़ के लिये दुनिया शब्द बनता है।
अल्लाह ने पूरी कायनात (ब्रह्माण्ड) में सबसे बेहतर (आला) इन्सान को बनाया है। और उसको निम्नतम श्रेणी से सम्बन्धित स्थान अर्थात् दुनिया में भेजा। इसके साथ ही अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए दुनिया से विदा होने पर मनुष्य की जो स्थिति होती है उसको उदाहरण के तौर पर समझाने हेतु हम कह सकते हें कि सफ़ेद कपड़े पहनाकर यदि कुछ लोगों को कोयलों की कोठरी में से होकर गुज़ारने के बाद उनका अवलोकन करें तो हम देखेंगे कि किसी व्यक्ति के कपड़ों पर कम दाग़ होंगे, किसी के कपडों पर अधिक होंगे, कुछ के कपड़े ऐसे होंगे कि रंग का पता ही न चलेगा और उनमें जो उत्तम श्रेणी के लोग होंगे उनके कपड़ों पर कोई दाग़ न होगा और वही कामयाब कहलाने के हक़दार होंगे। इन्हीं सब बातों को ध्यान नें रखते हुए हमको अपने जीवन का मक़सद समझना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि इस दुनिया से विदा होते समय हमारा दामन दाग़दार न हो।
Monday, July 19, 2010
कर्ज़न के गधे by-sharif khan
अंगरेज़ों के राज में भारत के वायसराय लार्ड कर्ज़न जब अपने देश वापस जाने लगे तो परम्परानुसार उन्होंने लोगों को उनकी हैसियत और ख़िदमत के मुताबिक़ पुरस्कार आदि दिये। जैसी कि एक कहावत है कि, ‘‘दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है‘‘ के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा जिस व्यक्ति से वह खुश थे वह था उनका बावर्ची (रसोइया) लिहाज़ा उसको उसी की इच्छानुसार इनाम देने के लिये उससे कहा कि चूंकि तुमने हमारी बहुत सेवा की है और बहुत लज़ीज़ खाने खिलाए हैं इसलिए हम चाहते हैं कि तुम जो मांगना चाहो वह हमसे मांग लो। यह सुनकर बावर्ची ने कहा कि सरकार आपने सदैव मेरा ख़याल रखा है इसलिए मुझे जो कुछ आप देंगे उस से बेहतर मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता लेकिन जब उससे दोबारा उसकी इच्छा पूछी गई तो उसने कहा कि हुज़ूर मेरा बेटा पढ़ने में कमज़ोर होने के कारण हाई स्कूल में फ़ेल हो गया है। यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरे बेटे को कलक्टर बना दीजिए। और इस प्रकार से उस बावर्ची का हाई स्कूल फ़ेल पुत्र कलक्टर बना दिया गया। ऐसे विशिष्ट पद उपरोक्त पाविारिक पृष्ठभूमि व शैक्षिक योग्यता वाले व्यक्ति के को सौंपा जाना एक अजूबा था और अजूबा ही साबित भी हुआ क्योंकि उसने अपने स्तर के अनुसार ऐसे अनाप शनाप काम किये कि जल्दी ही उसके ख़िलाफ़ शिकायतों की एक पूरी फ़ाइल तैयार हो गई परन्तु उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में कोई भी सक्षम नहीं था। अन्त में उसके ख़िलाफ़ तैयार की गई फ़ाइल को लार्ड कर्ज़न के अवलोकनार्थ इस टिप्पणी के साथ इंग्लैण्ड भेजा गया कि कृपया अपने इस गधे के कारनामों पर विचार करके निर्देश देने का कष्ट करें।
जवाब में लार्ड कर्ज़न ने लिखा कि भारत में बहुत सारे गधे पल रहे हैं उनके साथ यदि मेरा भी एक गधा परवरिश पाता रहेगा तो देश का बहुत ज़्यादा अहित न होगा।
उपरोक्त कथन चाहे सच पर आधारित न हो परन्तु यदि हम बारीकी से देखें तो क्या प्रत्येक क्षेत्र में कर्ज़न के गधे मौजूद नहीं हैं? पुलिस हो चाहे प्रशासन हो, ऐसे अजीब फ़ैसले लिये जाते हैं कि सुनकर हैरानी होती है। पुलिस हिरासत में मौत (क़त्ल), फ़र्जी मुठभेड़ के द्वारा क़त्ल और आला अधिकारियों के द्वारा इस प्रकार के अपराधियों का पक्ष लेना आदि वारदातों की बाढ़ सी आई हुई है और ऐसे नरपिशाचों की सरपरस्ती करने के लिये देश में ही बहुत सारे कर्ज़न मौजूद हैं। बुद्धिजीवी वर्ग इस ओर भी ध्यान देकर यदि कुछ समाधान निकाल सके तो देशहित में योगदान होगा।
जवाब में लार्ड कर्ज़न ने लिखा कि भारत में बहुत सारे गधे पल रहे हैं उनके साथ यदि मेरा भी एक गधा परवरिश पाता रहेगा तो देश का बहुत ज़्यादा अहित न होगा।
उपरोक्त कथन चाहे सच पर आधारित न हो परन्तु यदि हम बारीकी से देखें तो क्या प्रत्येक क्षेत्र में कर्ज़न के गधे मौजूद नहीं हैं? पुलिस हो चाहे प्रशासन हो, ऐसे अजीब फ़ैसले लिये जाते हैं कि सुनकर हैरानी होती है। पुलिस हिरासत में मौत (क़त्ल), फ़र्जी मुठभेड़ के द्वारा क़त्ल और आला अधिकारियों के द्वारा इस प्रकार के अपराधियों का पक्ष लेना आदि वारदातों की बाढ़ सी आई हुई है और ऐसे नरपिशाचों की सरपरस्ती करने के लिये देश में ही बहुत सारे कर्ज़न मौजूद हैं। बुद्धिजीवी वर्ग इस ओर भी ध्यान देकर यदि कुछ समाधान निकाल सके तो देशहित में योगदान होगा।
Saturday, July 17, 2010
holy books are respectable पवित्र ग्रन्थ की ग़लत व्याख्या करना मानसिक दिवालियापन sharif khan
स्वतन्त्र भारत में देश के संविधान ने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता बेशक दी है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी धर्म और आस्थाओं के खि़लाफ़ कोई भी ऐसी टिप्पणी या अनर्गल बात कही जाए जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचने का अन्देशा हो। बंगलादेश की कुख्यात लेखिका ‘तस्लीमा नसरीन’ ने एक अंग्रेज़ी अख़बार में पवित्र क़ुरआन की ग़लत व्याख्या देकर अपनी जहालत और इस्लाम दुश्मनी का सबूत पेश किया है। उदाहरण के तौर पर क़ुरआन के हवाले से वह कहती हैं कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है, जबकि पृथ्वी पहाड़ों की मदद से अपनी जगह रुकी हुई है। हालांकि क़ुरआन में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा। क़ुरआन की ग़लत व्याख्या करके लेखिका का मक़सद शायद यह साबित करना रहा हो कि सृष्टि की रचना करने वाले अल्लाह को ऐसे सामान्य से तथ्यों का भी ज्ञान नहीं है जिनको एक हाई स्कूल का छात्र भी जानता है। इसी लिये हम सभी को पैदा करने वाले की पवित्र किताब में ग़लती निकालने के बजाय उसकी आयतों का सही मतलब जान लिया गया होता तो उपरोक्त लेखिका का मानसिक दिवालियापन ज़ाहिर न होता।
पवित्र क़ुरआन के 36वें अध्याय की 38वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘और सूरज अपने ठिकाने की ओर जा रहा है।’’ इससे सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाना कहीं भी साबित नहीं होता। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में ‘सन’ की व्याख्या में यह लिखा है कि सौरमण्डल 20 किलोमीटर प्रति सेकिण्ड के वेग से चल रहा है। अर्थात सूर्य अपने ग्रहों सहित उपरोक्त वेग से चल रहा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि पवित्र कु़रआन में यह बात उस समय कही गई थी जब यह माना जाता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और चांद सूरज आदि सब उसके चक्कर लगा रहे हैं। फिर यह माना जाने लगा कि सूर्य एक जगह रुका हुआ है और पृथ्वी उसके चक्कर लगा रही है। इस प्रकार से जैसे जैसे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती गई उसी के अनुसार वह उन तथ्यों से अवगत होता गया जिनसे पहले अनभिज्ञ था। परन्तु क़ुरआन तो जैसा प्रारम्भ में था वह ही आज है और हमेशा ऐसा ही रहेगा।
इसके बाद वह लिखती हैं कि क़ुरआन में महिलाओं को ग़ुलाम तथा कामवासना को शान्त करने का साधन मात्र कहा गया है।
इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन की दो आयतों का हवाला देना ही पर्याप्त होगा। दूसरे अध्याय की 187वीं आयत में पति-पत्नि के आपसी सम्बन्ध के सिलसिले में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो।’’ इन थोड़े से शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया है। अर्थात जिस प्रकार लिबास शरीर की सुरक्षा करता है, उसी प्रकार पति-पत्नि एक दूसरे की सुरक्षा करें। और शरीर के लिए जिस प्रकार से लिबास सौन्दर्य का साधन होता है, उसी प्रकार से पति-पत्नि भी एक दूसरे की ज़ीनत बनकर रहें तथा जिस प्रकार जिस्म और लिबास के बीच कोई पर्दा नहीं होता, उसी प्रकार पति-पत्नि के बीच कोई पर्दा नहीं होता। यदि महिलाओं को ग़ुलाम समझा गया होता तो क्या उनमें परस्पर जिस्म और लिबास का सम्बन्ध क़ायम करने की बात कही जा सकती थी। इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन के अध्याय चार की 34वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि मर्द औरतों पर क़व्वाम हैं, इस बिना पर कि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर फ़ज़ीलत दी है।’’ जैसा कि सभी जानते हैं कि शारीरिक दृष्टि से तथा धैर्यवान होने आदि अनेक बातों में मर्द औरत की तुलना में बेहतर और मज़बूत होता है इसीलिए अल्लाह ने मर्द को औरत का क़व्वाम बनाकर ज़्यादा ज़िम्म्मेदारी सौप दी क्योंकि क़व्वाम कहते हैं सुरक्षा करने वाला तथा खाने पहनने व दूसरी हर प्रकार के हितों की देखभाल करने वाला और ज़रूरतों को पूरा करने वाला। इसका साफ़ मतलब यह है कि महिलाओं को हर प्रकार के टेन्शन से आज़ाद कर दिया। इस कथन में तो मर्द ग़ुलामों वाले काम करता हुआ प्रतीत होता है न कि औरत परन्तु तसलीमा नसरीन ने पता नहीं किस तरह से औरतों को मर्दों का ग़ुलाम समझे जाने का मतलब निकाल लिया।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमको चाहिए कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थों की अपने तौर से ग़लत व्याख्या करने का प्रयास करने के बजाय उनमें दी गई शिक्षाओं से लोगों को अवगत कराने कोशिश करके आपसी भाईचारे को बढ़ाने में मददगार साबित हों।
पवित्र क़ुरआन के 36वें अध्याय की 38वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘और सूरज अपने ठिकाने की ओर जा रहा है।’’ इससे सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाना कहीं भी साबित नहीं होता। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में ‘सन’ की व्याख्या में यह लिखा है कि सौरमण्डल 20 किलोमीटर प्रति सेकिण्ड के वेग से चल रहा है। अर्थात सूर्य अपने ग्रहों सहित उपरोक्त वेग से चल रहा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि पवित्र कु़रआन में यह बात उस समय कही गई थी जब यह माना जाता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और चांद सूरज आदि सब उसके चक्कर लगा रहे हैं। फिर यह माना जाने लगा कि सूर्य एक जगह रुका हुआ है और पृथ्वी उसके चक्कर लगा रही है। इस प्रकार से जैसे जैसे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती गई उसी के अनुसार वह उन तथ्यों से अवगत होता गया जिनसे पहले अनभिज्ञ था। परन्तु क़ुरआन तो जैसा प्रारम्भ में था वह ही आज है और हमेशा ऐसा ही रहेगा।
इसके बाद वह लिखती हैं कि क़ुरआन में महिलाओं को ग़ुलाम तथा कामवासना को शान्त करने का साधन मात्र कहा गया है।
इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन की दो आयतों का हवाला देना ही पर्याप्त होगा। दूसरे अध्याय की 187वीं आयत में पति-पत्नि के आपसी सम्बन्ध के सिलसिले में अल्लाह फ़रमाता है कि ‘‘वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो।’’ इन थोड़े से शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया है। अर्थात जिस प्रकार लिबास शरीर की सुरक्षा करता है, उसी प्रकार पति-पत्नि एक दूसरे की सुरक्षा करें। और शरीर के लिए जिस प्रकार से लिबास सौन्दर्य का साधन होता है, उसी प्रकार से पति-पत्नि भी एक दूसरे की ज़ीनत बनकर रहें तथा जिस प्रकार जिस्म और लिबास के बीच कोई पर्दा नहीं होता, उसी प्रकार पति-पत्नि के बीच कोई पर्दा नहीं होता। यदि महिलाओं को ग़ुलाम समझा गया होता तो क्या उनमें परस्पर जिस्म और लिबास का सम्बन्ध क़ायम करने की बात कही जा सकती थी। इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन के अध्याय चार की 34वीं आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि मर्द औरतों पर क़व्वाम हैं, इस बिना पर कि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर फ़ज़ीलत दी है।’’ जैसा कि सभी जानते हैं कि शारीरिक दृष्टि से तथा धैर्यवान होने आदि अनेक बातों में मर्द औरत की तुलना में बेहतर और मज़बूत होता है इसीलिए अल्लाह ने मर्द को औरत का क़व्वाम बनाकर ज़्यादा ज़िम्म्मेदारी सौप दी क्योंकि क़व्वाम कहते हैं सुरक्षा करने वाला तथा खाने पहनने व दूसरी हर प्रकार के हितों की देखभाल करने वाला और ज़रूरतों को पूरा करने वाला। इसका साफ़ मतलब यह है कि महिलाओं को हर प्रकार के टेन्शन से आज़ाद कर दिया। इस कथन में तो मर्द ग़ुलामों वाले काम करता हुआ प्रतीत होता है न कि औरत परन्तु तसलीमा नसरीन ने पता नहीं किस तरह से औरतों को मर्दों का ग़ुलाम समझे जाने का मतलब निकाल लिया।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमको चाहिए कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थों की अपने तौर से ग़लत व्याख्या करने का प्रयास करने के बजाय उनमें दी गई शिक्षाओं से लोगों को अवगत कराने कोशिश करके आपसी भाईचारे को बढ़ाने में मददगार साबित हों।
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