उत्तरप्रदेश में लाए जाने वाले दो बच्चों वाले जनसंख्या क़ानून का भयावह रूप यहां की हिन्दू समाज में उस समय देखने को मिलेगा जब लड़कियों को गर्भ में ही समाप्त करके केवल दोनों लड़के पैदा करने की परम्परा पैदा हो जाएगी।
मुसलमानों का जहां तक संबंध है तो उनका इस बात पर पुख़्ता ईमान है कि पैदा होने वाले बच्चे अपना भाग्य साथ लेकर आते हैं और पैदा करने वाला उनकी परवरिश का पहले ही प्रबंध कर कर देता है इसलिए मुस्लिम समाज में भ्रूण हत्या का चलन नहीं है। कुछ लोग मूर्खता वश मुसलमानों को शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ कहते हैं जबकि आमतौर से हिन्दुओं और मुसलमानों में थोड़ा ही अन्तर है। चूंकि हिन्दुओं में कमाऊ पत्नी की मांग ज़्यादा है इसलिए मुस्लिम लड़कियों के मुक़ाबले में हिन्दू लड़कियों को ऐसी शिक्षा ज़्यादा दी जाती है जिसके ज़रीये वह नौकरी हासिल करके धन कमाने की मशीन बन कर घर चलाने में अपने पति का सहयोग कर सके। इस प्रकार मुस्लिम समाज में पत्नियां अक्सर घरों में रहती हैं जबकि हिन्दू समाज की महिलाओं को नौकरी आदि के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है इस वजह से लोग यह समझते हैं कि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं। हिन्दू समाज और मुस्लिम समाज में अमीरी और ग़रीबी का फ़र्क ख़ासतौर से दो कारणों से होता है। पहला कारण यह है कि हिन्दुओं में ज़्यादातर परिवारों में पति-पत्नी दोनों कमाते हैं और दूसरा कारण मुसलमानों के साथ पक्षपात होने के कारण उनको आसानी से नौकरी नहीं मिलती है।
जनसंख्या की बात करें तो आजकल अक्सर 28 30 साल की उम्र में विवाह होता है जबकि पहले 20 22 साल की उम्र तक विवाह हो जाना आम बात थी। इस प्रकार यह 8 10 साल का जो फ़र्क आया है इस अंतराल में जो 4 5 बच्चे पैदा होते उनके न होने से स्वतः ही जनसंख्या कंट्रोल हो रही है। इसके अलावा बड़ी उम्र में विवाह होने के कारण प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती है इस प्रकार यह भी जनसंख्या कंट्रोल में सहायक हो रहा है इसलिए ऐसे क़ानून की कोई आवश्यकता नहीं है।
अब ग़रीबी, महंगाई, बेरोज़गारी और कुशासन से लोगों का ध्यान हटाने के मक़सद से सरकार जनसंख्या क़ानून ला रही है और इस प्रकार सरकार अपने मक़सद में कुछ हद तक कामयाब भी हो जाएगी लेकिन इसका नुक़सान हिन्दुओं को भुगतना पड़ सकता है क्योंकि उनको कमाने वाला चाहिए और जब दो ही बच्चे होने हैं तो दोनों लड़के ही हों ताकि एक नाकारा निकल आए तो दूसरे लड़के के रूप में विकल्प मौजूद हो इसलिए वह लड़कियों को पैदा ही न करेंगे और चूंकि बच्चे लड़कियों से ही पैदा होते हैं इसलिए लड़कियों के कम होने या न होने पर हिन्दू आबादी इस जनसंख्या क़ानून के कारण नष्ट हो जाएगी। मुसलमानों की बात करें तो चूंकि इस क़ानून में दो से अधिक बच्चे होने पर कोई सज़ा का प्रावधान न होकर सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ और नौकरियों आदि से वंचित करने की बात कही गई है और चूंकि मुसलमान इन चीज़ों से पहले ही वंचित किये जा रहे हैं इसलिए उन पर दो से अधिक बच्चे पैदा होने से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
प्रत्येक धर्म में शब्दों के कुछ अन्तर से एक ही बात कही गई है कि हर इन्सान को मरने के बाद दुनिया में किये गए कर्मों के अनुसार स्वर्ग या नरक में भेजा जाएगा। इस्लाम धर्म में इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहा गया है कि क़यामत आएगी और सभी लोग मर जाएंगे। उसके बाद सारी ज़मीन को एक मैदान का रूप देकर जितने लोग भी दुनिया में पैदा हुए उन सबको एक साथ ज़िन्दा करके उस मैदान में जमा किया जाएगा और हरएक व्यक्ति का हिसाब होगा। हर व्यक्ति को उसके छोटे से छोटे और बड़े से बड़े गुनाह को उसकी आँखों से दिखा दिया जाएगा ताकि वह फ़ैसले से सन्तुष्ट हो सके क्योंकि उस अदालत में सारे जजों का जज फ़ैसला करेगा और न तो वह पूर्वाग्रह से ग्रसित होगा और न ही कुछ ख़ास लोगों के विवेक (conscience) या चाहत को सन्तुष्ट करना उसका मक़सद होगा। उसको न तो इस बात का डर होगा कि फ़ैसले के जो ख़िलाफ़ गुण्डे और मवालियों के हंगामे से क़ानून और व्यवस्था ख़राब हो जाएगी और न ही अपराधी के छोटे या बड़े होने से सज़ा में कोई अन्तर पड़ेगा।
क्या अजब नज़ारा होगा कि, अपराधी को केवल अपराधी की नज़र से देखा जाएगा चाहे दुनिया में वह,
* जानबूझ कर गलत फ़ैसले देने वाला किसी सर्वोच्च न्यायालय का जज रहा हो। या
* किसी जज को गले में लालच का पट्टा पहनने पर मजबूर करके कुत्ते के मानिन्द उससे काम लेते हुए उससे मनचाहे फ़ैसले कराने वाला देश का मुखिया रहा हो। या
* बेगुनाहों पर अत्याचार करने के लिए अपनी फ़ौज का ग़लत इस्तेमाल करने वाला कोई जनरल रहा हो। या
* जनता की हिफ़ाज़त करने के बजाय उसको अपने संगठित गुंडों के हवाले करके क़त्ल, बलात्कार और लूट कराने वाला कोई शासक रहा हो। या
* साम्प्रदायिकता के बीज बो कर देश का वातावरण दूषित करने वाला कोई राजनेता रहा हो। या
* क़ौम का सौदा करके ज़ालिमों का साथ देने वाला कोई मौक़ा परास्त धर्म गुरु रहा हो।
आदि हर प्रकार के अपराधी अपराध के अनुसार सज़ा पाएंगे। यह इसलिए भी ज़रूरी होगा क्योंकि अपराधी को सज़ा दिये बिना इंसाफ़ मुकम्मल नहीं होता है।
क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री द्वारा क़ानून को ताक़ पर रख कर और पुलिस को नज़रअन्दाज़ करके गुण्डों को दंगा करने की छूट दिया जाना उचित है? इससे पहले 2002 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री ने हिन्दू दंगाईयों को वहां के मुसलमानों को क़त्ल करने और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करने की छूट देते हुए सुरक्षाबलों को दंगाईयों के ख़िलाफ़ सख़्ती करने से रोका था और उस दौरान हज़ारों बेगुनाह मुसलमानों को क़त्ल होते हुए और अनगिनत महिलाओं को बेइज़्ज़त होते हुए अदालत के अलावा पूरी दुनिया ने देखा था। भाजपा की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री ने तो गुजरात को भी पीछे छोड़ दिया है। मुख्यमन्त्री योगी ने यह बयान देकर कि, "अल्पसंख्यक शान्त रहेगा तो बहुसंख्यक भी दंगा नहीं करेगा" यह तो तसलीम कर ही लिया कि बहुसंख्यक समाज के दंगाईयों की कमान इन्ही के हाथ में है क्योंकि इस बयान में इसी तरह की भाषा इस्तेमाल की गई है जैसे किसी गैंग का लीडर अपने गैंग का प्रतिनिधित्व करते हुए यह धमकी देता है कि, अगर यह बात न मानी तो मेरा गैंग 'ऐसा' कर देगा। ध्यान रहे योगी के इस बयान में अल्पसंख्यक शब्द मुसलमानों के लिये प्रयोग किया गया है और बहुसंख्यक भगवा दंगाईयों के लिये प्रयोग किया गया है। प्रदेश के मौजूदा हालात पर यदि नज़र डालें तो एक भी मामला ऐसा नहीं है जिसमें किसी मुसलमान ने दंगा भड़काने की कोशिश की हो जबकि भगवा दंगाईयों द्वारा की गई एक भी वारदात ऐसी नहीं है जिसमें पीड़ित मुसलमान के द्वारा कोई अपराध किया गया हो। विचार करने वाली बात यह भी है कि यदि कोई अपराध किया जाता तो उसके लिये पुलिस मौजूद है लिहाज़ा किसी आरोपी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हक़ पुलिस के अलावा किसी जो भी नहीं है। इस बयान में यह कहना कि यदि अल्पसंख्यक शान्त रहेगा तो बहुसंख्यक दंगा नहीं करेगा पूरी तरह गुण्डों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कोई भी आरोप होने पर क़ानून हाथ में लेकर दंगा कर सकते हैं जबकि कहना यह चाहिए था कि बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक, जो भी अशान्ति फैलाएगा पुलिस उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी। उपरोक्त बयान में जो यह कहा गया है कि, "अल्पसंख्यक शान्त रहेगा" इसमें शान्त रहने की बात इसलिये अर्थहीन है क्योंकि अख़लाक़ द्वारा अपने घर में बकरे का गोश्त रखना क्या उसके द्वारा अशान्ति फैलाना था? या जुनैद का ट्रेन में सफ़र करना किस तरह अनुचित था? जुनैद को तो यह कह कर मारा गया था कि यह गाय खाने वाला है। चूँकि सभी वारदातें झूटा आरोप लगा कर तुरन्त क़त्ल करने की हैं लिहाज़ा इस प्रकार से किये जाने वाले क़त्ल और दंगा फ़साद की इस परम्परा को आगे बढ़ाने में मुख्यमन्त्री का यह बयान काफ़ी सहायक होगा। इस प्रकार चूँकि मुख्यमन्त्री भी क़ानून से ऊपर नहीं होता इसलिये उपरोक्त बयान को दण्डनीय अपराध मानते हुए क़ानून को अपना काम करना चाहिए।
इस्लामी शरीयत में हर बात क़ुरआन और हदीस के ज़रीये स्पष्ट रूप से समझा दी गई है और यह चूँकि अल्लाह की तरफ़ से भेजी गई है लिहाज़ा इसकी बुनियादी बातों में किसी भी प्रकार के संशोधन की गुंजायश नहीं है। अगर आंशिक रूप से कोई समस्या पैदा होती है तो उसका समाधान उलेमा के ज़रीये क़ुरआन व हदीस की रौशनी में किये जाने का प्रावधान है। इस प्रकार शरीयत की सीमाओं में रहते हुए नए नए वैज्ञानिक अविष्कारों का प्रयोग किस तरह किया जाए इस बात के लिये उलेमा की राय ही अन्तिम फ़ैसले की हैसियत रखती है। मिसाल के तौर पर बन्दूक़ की ईजाद होने के बाद उससे मारे गए शिकार के हलाल होने का मसअला बुनियादी न होकर आंशिक (जुज़वी) था लिहाज़ा अल्लाह का नाम लेकर चलाई गई गोली से अगर शिकार मर जाता है तो उसको हलाल मान लिया गया क्योंकि बुनियादी बात तो अल्लाह का नाम लेना और उस जानवर का खून बहा देना है। इस बात को अल्लाह के रसूल स अ व ने एक हदीस में इस तरह फ़रमाया है कि, "खून बहा दो जिस चीज़ से चाहो और अल्लाह का नाम लो।" इसी प्रकार तलाक़ के मामले में बुनियादी बात तो तीन मर्तबा तलाक़ के अलफ़ाज़ का दोहराना है जिसके लिये सही तरीक़ा अपनाने के लिए एक एक महीने के अन्तराल का निर्देश दिया गया है लेकिन अगर एक साथ ही तीन तलाक़ दे दिये जाते हैं तो तलाक़ तो हो जाता है लेकिन ऐसे व्यक्ति को सज़ा का भी प्रावधान है। चूँकि इस तरह तलाक़ मान्य होना हदीस से साबित है लिहाज़ा इसके ख़िलाफ़ कुछ भी कहना गुनाह होता है। पिछली चौदह सदियों से यही व्यवस्था चली आ रही है क्योंकि इसको मुस्लिम औरतों और मर्दों ने शरीयत के अन्तर्गत होने के कारण समान रूप से स्वीकार किया हुआ है। यह भी हक़ीक़त है कि मुस्लिम विवाह और तलाक़ के विवादों को हल करने का अधिकार किसी भी ग़ैरमुस्लिम संस्था को न होकर केवल मुस्लिम उलेमा को है। इस प्रकार चूँकि तीन तलाक़ कहने से तलाक़ हो जाता है और ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति उस तलाक़शुदा औरत के लिये ग़ैर महरम हो जाता है लिहाज़ा उन दोनों के दरमियान पति पत्नी के सम्बन्ध बनाना ज़िनाकारी है लिहाज़ा किसी कोर्ट से या सरकार से पति पत्नी के रूप में सम्बन्ध बहाल किये जाने की अपील करना बलात्कार कराने की इजाज़त मांगने जैसा है जिसके ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज को एकजुट होकर विरोध करना चाहिए।
अल्लाह ने इंसान के खाने के लिये बहुत सी नेअमतें पैदा की हैं जिनमें गाय, भैंस, बकरी आदि जानवर भी हैं। जानवरों को खाने के लिये जब काटा जाता है तो उसके लिये भी कुछ नियम हैं जैसे उसको भूखा प्यासा न रखो तथा तेज़ छुरी से इस प्रकार काटो कि उसको कम से कम कष्ट हो क्योंकि उसको सज़ा देने के लिये नहीं काटा जाता है बल्कि उससे भोजन प्राप्त करना मक़सद होता है। भारत में गौरक्षकों के रूप में कुछ लोगों का दल वजूद में आया है जो गौलुटेरे हैं। चूँकि यह गौलुटेरे भाजपा द्वारा वजूद में लाए गए हैं लिहाज़ा जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकार है और गाय काटने को क़ानून द्वारा प्रतिबन्धित किया हुआ है वहां गाय के द्वारा मुसलमानों को प्रताड़ित करके साम्प्रदायिकतवादी हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करना भी इनकी ज़िम्मेदारी में आता है। राजस्थान के गृहमन्त्री गुलाब चन्द कटारिया ने बयान दिया है कि यदि गो तस्करी की सूचना या आशंका होती है तो गोरक्षक वाहनों को रोक सकते हैं लेकिन उन्हें किसी के साथ मारपीट नहीं करनी चाहिए। इन गौलुटेरों के सरकारी संरक्षण में परवरिश पाने के सबूत के लिये एक मन्त्री द्वारा अपने गिरोह के कार्यकर्ताओं को दिए जाने वाले निर्देश के रूप में यह बयान ही काफ़ी है। यह लुटेरे मुसलमानों की गायों को लूट कर ले जाते हैं और किसी गौशाला में उनको दाख़िल करा देते हैं। गौशाला में गायों के चारे के नाम से प्राप्त होने वाला धन सब लोग मिलबांट कर खा जाते हैं और मौक़ा मिलने पर कुछ गायों को भी क़साई के हाथों बेच कर अपनी जेब गरम कर लेते हैं। मुसलमानों से छीन कर और आवारा घूमने वाली गायों को पकड़ कर गौशालाओं में दाखिल की गई बेज़बान गायों को भूख से तड़पा कर जिस तरह दर्दनाक मौत मारा जाता है उसको देख कर दिल कांप जाता है। क्या यह गौ हत्या नहीं है? सच तो यह है कि केवल यही गौहत्या है क्योंकि काटी जाने वाली गाय के पीछे तो भोजन प्राप्त करना एक मक़सद होता है लेकिन गौशाला में भूख व प्यास से गायों को मारने का क्या औचित्य है? गुजरात में गाय काटने को अपराध मानते हुए ऐसा करने वालों के लिये मौत की सज़ा तजवीज़ की गई है जबकि भूख प्यास से मारने वालों को कोई भी सज़ा देने का प्रावधान नहीं है। क्या यह इसलिये है कि भूख से मारने वाले सरकारी संरक्षण प्राप्त गौलुटेरे हिन्दू हैं? ऐसे हालात में देशवासियों को चाहिए कि गाय के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए मुसलमानों पर से गाय खाने पर प्रतिबन्ध हटवाने का आह्वान करें और गौशालाओं में गायों को भूख से तड़पा कर मारने वाले अपराधियों को मौत की सज़ा दिलवाएं चाहे ऐसे अपराधी कोई मन्त्री हों या गोरक्षक दल चलाने वाले हिन्दू नेता हों या कोई भी हों।
पशु प्रेम बुरी बात नहीं है लेकिन अगर कोई शख़्स प्रेम दर्शाने के लिये किसी पशु से अपना रिश्ता क़ायम करते हुए उसको मां बना ले तो उससे उस पशु पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि जन्म देने वाली मां का निरादर अवश्य होता है लेकिन यह चूँकि उनका व्यक्तिगत मामला है लिहाज़ा किसी को इस पर ऐतराज़ करने का हक़ नहीं है। इससे यह अनुमान लगाने में आसानी हो जाती है कि ऐसे लोगों का उस पशु के साथ व्यवहार किस प्रकार का होगा। मिसाल के तौर पर जो हिन्दू गाय को मां मानते हैं उन्हीं के यहां वृद्धावस्था में मां बाप को वृद्धाश्रम भेजने की परम्परा है। इसी प्रकार यह गोभक्त गाय से लाभ तो प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन जब वह दूध देना बन्द कर देती है तो उसको क़साई के हाथ बेच देते हैं ताकि वह उसको काट कर उसकी हड्डियां, गोश्त और खाल निकाल कर मुनाफ़ा वसूल कर सके। इनमें से जो लोग किसी कारण से ऐसा नहीं करते तो उनके यहां जिस तरह अशक्त मां बाप को वृद्धाश्रम भेजा जाता है उसी तरह गाय को भूख से तड़प कर अपनी जान देने के लिये गौशाला भेज देते हैं जहां अगर उसके भाग्य में अच्छी मौत लिखी होती है तो गौशाला वाले उसको क़साई के हाथ बेच कर उससे छुट्टी पा लेते हैं वरना वह भूखी प्यासी मर जाती है। गाय को मां कहने वाले उपरोक्त गोभक्तों और गो रक्षकों के विपरीत यदि कथित गो भक्षकों (मुसलमानों) के गाय के प्रति व्यवहार पर विचार करें तो जो मुसलमान गाय पालते हैं तो वह कभी उसको घर से बाहर लावारिस की तरह नहीं निकालते हैं और उसके चारे का बेहतरीन प्रबन्ध करते हैं यहांतक कि दूध देना बन्द कर देने के बाद भी उसकी उचित देखभाल करते हैं क्योंकि ऐसी स्थिति आने पर उससे अच्छा मांस प्राप्त होता है। इस प्रकार आख़री सांस तक मुसलमान के घर पलने वाली गाय न तो भूखी रहती है और न ही कूढ़े के ढेर में अपनी ख़ुराक तलाश करने के लिये बाहर निकाली जाती है। पवित्र क़ुरआन की सूरह यासीन की 71, 72 व 73 वीं आयतों में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "क्या यह लोग देखते नहीं हैं कि हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से इनके लिये मवेशी पैदा किये और अब यह उनके मालिक हैं। हमने उन्हें इस तरह इनके बस में कर दिया है कि उनमें से किसी पर यह सवार होते हैं, किसी का यह गोश्त खाते हैं और उनके अन्दर इनके लिये तरह तरह के फ़ायदे और पेय पदार्थ हैं।" इस प्रकार दूसरे चौपायों के साथ गाय भी चूँकि अल्लाह ने जायज़ बताई है लिहाज़ा क़ुरआन की इस आयत के अनुसार गाय के बछड़ों से बोझ ढोने का काम लेते हैं, गाय का दूध पीते हैं और इस क़ाबिल न रहने पर उसका मांस खाते हैं। इस प्रकार यदि कथित गो रक्षकों और कथित गो भक्षकों के यहां पलने वाली गायों के साथ होने वाले व्यवहार की तुलना करें तो नतीजे के तौर पर यही हक़ीक़त सामने आती है कि गाय मुसलमानों के संरक्षण में ही सुरक्षित है।
मक्का शहर में जब पैग़म्बर स अ व ने लोगों को केवल अल्लाह ही की इबादत करने और अल्लाह के सिवा किसी को भी इबादत के लायक़ न समझने का पैग़ाम दिया तो पूरे इलाक़े में तहलका मच गया और लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उस समय अरब में गुमराह लोगों ने लात, मनात और उज़्ज़ा नामक देवियों के अलावा सैकड़ों ख़ुदा बना रखे थे और उनकी मूर्तियों की पूजा करते थे। पैग़म्बर स अ व की बातों से प्रभावित होकर जो लोग इस्लाम में दाख़िल हो जाते थे उनके विरोध में तमाम इस्लाम विरोधियों के एकजुट हो जाने के बावजूद भी मुसलमानों की तादाद बढ़ती जा रही थी। ऐसी स्थिति में जब उन्होंने इस हक़ीक़त को समझ लिया कि इस्लाम ही सच्चाई का मार्ग है और यह निकट भविष्य में पूरे अरब में फैल जाएगा तो वह मुसलमानों के साथ मारपीट और उनके ख़िलाफ़ विभिन्न प्रकार के दुष्प्रचार तो करते ही थे लेकिन इसके साथ ही पैग़म्बर स अ व से समझौते की बातचीत की भी कोशिश करते रहते थे। जिस प्रकार जाली नोट चलाने के लिये असली नोटों का सहारा लिया जाता है और असली नोटों में उनको मिलाकर चलाने से जाली नोटों का वजूद ख़त्म होने से बचा रहता है उसी तरह इस्लाम विरोधी लोग पैग़म्बर स अ व के सामने तरह तरह की पेशकश रखते थे। कभी वह कहते थे कि आप हमारे खुदाओं को और देवी देवताओं की पूजा करो तो हम भी आपके अल्लाह की इबादत करेंगे और कभी कहते थे कि कुछ दिन आप हमारे खुदाओं को पूज लिया करो तो कुछ दिन हम आपके अल्लाह की उपासना कर लिया करेंगे। इस प्रकार वह चाहते थे कि कोई बीच का रास्ता निकल आए ताकि इस्लाम के सच्चाई के मार्ग के सहारे उनकी गुमराही का वजूद भी बना रहे। इन सब बातों के जवाब में अल्लाह ने पैग़म्बर स अ व को जो आदेश दिया वह इस प्रकार है। क़ुरआन पाक की सूरह अलकाफ़िरून की 1,2,3 व 6 वीं आयतों में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "कह दो कि ऐ काफ़िरो, मैं उनकी इबादत नहीं करता जिनकी इबादत तुम करते हो और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो जिसकी इबादत मैं करता हूँ। तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन है और मेरे लिये मेरा दीन।" इस प्रकार बिना किसी लाग लपेट के जिस अन्दाज़ में दो टूक बात कही गई है वह मुसलमानों को राह दिखाने के लिये काफ़ी है जिसके अन्तर्गत जहां भी दीन के मामले में किसी तरह की भी मिलावट की झलक मिले उसको फौरन नकार देना चाहिए चाहे वह सूर्य नमस्कार को नमाज़ से जोड़ने की चाल हो या फिर वन्देमातरम का ग़ैरइस्लामी तसव्वुर हो। इस प्रकार 'तुम्हारा दीन तुम्हारे साथ और मेरा दीन मेरे साथ' वाला नजरिया ही आपसी भाईचारे को मज़बूत बना सकता है।
ईश्वर की उपलब्ध कराई हुई नेमतों में से लोग दूध आदि अनेक पवित्र चीजों का सेवन करते हैं परन्तु कुछ लोग इन चीजों के अलावा किसी आस्था वश गाय का पेशाब भी पीते हैं। इस प्रकार यदि पेशाब में आस्था रखने वाले लोग यह कहें कि पीने की क्रिया चूँकि समान है इसलिये दूध पीने वालों को गाय का पेशाब भी पी लेना चाहिए या दूध की महत्ता को देखते हुए वह यह कहने लगें कि दूध में पेशाब मिला कर पीने से आपस का भेदभाव ख़त्म होगा और भाईचारा बढ़ेगा तो यह मूर्खता है। वास्तव में भाईचारा बढ़ाने के लिये तो ज़रूरी यह है कि अपनी आस्था को न तो दूसरों पर थोपने की कोशिश की जाए और न ही दूसरों की आस्था पर किसी तरह का ऐतराज़ किया जाए और दोनों चीज़ों को मिलाकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश तो आपस में नफ़रत बढ़ाने वाली साबित होगी क्योंकि दूध में गाय का पेशाब मिला कर बीच का रास्ता तो बेशक कहलाएगा लेकिन वह स्वीकार्य किसी को भी न होगा। योगी आदित्य नाथ ने जिस तरह सूर्य नमस्कार और नमाज़ कि क्रिया को समानता के पैमाने पर नापने की कोशिश की है तो वह शारीरिक क्रिया के रूप में चाहे समान हो लेकिन आस्था में समानता नहीं हो सकती जबकि नमाज़ और सूर्य नमस्कार दोनों ही अमल केवल आस्थावश ही किये जाते हैं। इस तरह हिन्दू मुस्लिम के बीच पैदा की जा रही नफ़रत को किसी की आस्था के साथ छेड़खानी करके और ज़्यादा न बढ़ाया जाए और दोनों को अलग ही रहने दिया जाए तभी भाईचारा क़ायम रह सकता है।
बहुत पुरानी बात है हमारे एक मित्र इंग्लैण्ड चले गए थे और उनको वहां की नागरिता प्राप्त हो गई थी। उनकी माँ और एक अविवाहित बहन यहीं रहते थे जिनके खर्चे के लिये वह इंग्लैण्ड से रूपये भेजा करते थे। एक बार जब वह भारत आए तब मुझसे मुलाक़ात होने पर बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद को विवाहित दर्शाया हुआ है और पत्नी के नाम के कॉलम में अपनी बहन का नाम दर्ज कराया हुआ है ताकि सरकार से मिलने वाला फ़ैमिली भत्ता हासिल कर सकें। इस प्रकार प्राप्त होने वाले उस धन को वह भारत में अपनी माँ और बहन के खर्च के लिये भेज दिया करते हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि आपकी अगर शिकायत हो जाए तो आप थोड़े से लाभ के लिये क़ानून की गिरफ़्त में आ जाएंगे। इसके जवाब में उन्होंने जो कहा केवल वह सुनाने के लिये इतनी कहानी सुनानी पड़ी है। उन्होंने जवाब दिया था कि मुझे गर्व है उस देश का नागरिक होने पर कि जहां इस तरह की शिकायत प्राप्त होने पर सरकार यह कह कर उस शिकायत को नज़रअन्दाज़ कर देती है कि इस देश का नागरिक इस तरह का झूट नहीं बोल सकता और सरकार ऐसी शिकायत की सुनवाई करके अपने नागरिक के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाएगी। उत्तर प्रदेश में जिस तरह सरकारी और ग़ैरसरकारी एण्टी रोमियो स्क्वाड बना कर प्रदेश भर में फैला दिये गए हैं उन्होंने ऐसा आतंक फैलाया हुआ है कि शरीफ़ लोगों के लिये अपने नौजवान बच्चों को बाहर भेजना कठिन हो गया है। अजीब बात यह है कि क़ानून द्वारा वैध की गई लिव इन रिलेशन शिप के अन्तर्गत साथ रहने वाले बालिग़ लड़के लड़की का साथ साथ घर के बाहर निकलना किस तरह अवैध हो सकता है। इस समय इन एण्टी रोमियो दस्तों द्ववारा की जाने वाली वारदातों में एक के अन्तर्गत तो देवरिया ज़िले में साथ साथ जा रहे भाई बहन को पकड़ कर कोतवाली ले जाया गया जहां उनके मां बाप द्वारा अपने बेटे बेटी के रूप में पहचान कराने के बाद ही उनको छोड़ा गया। किसी शरीफ़ खानदान की बेटी को कोतवाली में ले जाए जाने पर उसके माँ बाप के दर्द को क्या विभिन्न प्रकार के आरोपों से ग्रस्त सरकार चलाने वाले लोग समझ पाएंगे? यहां एक ओर तो उपरोक्त इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा अपने नागरिक के सम्मान की सुरक्षा की मिसाल है और दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश में शरीफ़ लोगों को अपमानित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर किया जा रहा है। इस प्रकार जो सरकार अपने नागरिकों के सम्मान की भी सुरक्षा करने में समर्थ न हो उसको बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।
कानून द्वारा दिए गए अधिकार का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए जब उससे बड़ी अदालत में अपील की जाती है तो इसका सीधा सा मतलब यह होता है कि अपीलकर्ता उस से निचली अदालत का फैसला मानने से इन्कार कर रहा है। उस अदालत से भी हारने के बाद उसका हाई कोर्ट में अपील करना और हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना साबित करता है की निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक के किये गए फैसले ज़रूरी नहीं हैं कि इन्साफ पर खरे उतरें। सवाल यह पैदा होता है कि इन्ही जजों को पदोन्नत करके सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जाता है तो फिर यह कैसे मान लिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक ही होगा और इन्साफ पर आधारित होगा। जब उससे निचली अदालत नाइन्साफी कर सकती है तो सुप्रीम कोर्ट में इन्साफ ही होगा इस बात की क्या दलील है? किसी अपराधी को दी जाने वाली सबसे बड़ी सजा मौत की सजा है जो सामान्यतय क़त्ल या देशद्रोह के अपराधी को दी जाती है। मौत की सजा एक ऐसी सजा है जिसके ज़रिये से किसी शख्स को जिन्दा रहने के हक से महरूम कर दिया जाता है और इस सजा की एक ख़ास बात यह भी है कि सजा देने के बाद भूल सुधार या पुनर्विचार की गुन्जाईश ख़त्म हो जाती है। विड़म्बना यह है कि इतनी बड़ी सजा देने का मामला जज के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि यदि उसको वह अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम (rare to rarest) की श्रेणी में नज़र आता हो तो अपराधी से जिन्दा रहने का हक छीन लिया जाय। जबकि फैसला देने वाला शख्स भी उसी समाज का हिस्सा है जो कि साम्प्रदायिक दुर्भावना, भ्रष्टाचार से लबरेज़ है और अगर वह पूर्वाग्रह से ग्रसित भी हो तो नाइन्साफी की सम्भावना बढ़ जाती है। यदि संविधान में इस प्रकार का संशोधन किया जाना संसद के कार्यक्षेत्र में आता हो तो प्राथमिकता के तौर पर इस तरफ ध्यान देना आवश्यक है कि मौत की सजा को केवल जज के विवेकाधिकार पर आधारित न रहने दिया जाय बल्कि ऐसे फैसलों में विभिन्न धर्म गुरुओं को भी सम्मिलित रखे जाने का प्रावधान रखा जाय क्योंकि इस भौतिकवादी युग में धर्मगुरुओं के दिलों में मौजूद ईश्वर का खौफ गलत फैसले से बचाने में सहायक साबित होगा। यह भी सच है कि नाइन्साफी इन्कलाब को जन्म दिया करती है।
डॉक्टर ज़ाकिर नाईक ने इस्लाम के साथ ही दूसरे विभिन्न धर्मों का जिस गहराई से अध्ययन किया है और वह जिस प्रकार विभिन्न धर्म के लोगों के सवालों के जवाब देकर उनको सन्तुष्ट करते हैं, यह अपने आप में एक अजूबा होने के साथ हिन्दू मुस्लिम भाईचारा क़ायम करने में सहायक हो रहा है। इसी वजह से साम्प्रदायिकता के आधार पर वजूद में आने वाली सरकार डॉक्टर ज़ाकिर नाईक जैसे महान स्कॉलर के ख़िलाफ़ देशद्रोह, आतंकवाद और ऐसे ही दूसरे बेबुनियाद आरोप लगा कर उनको अपने ज़ुल्म का शिकार बनाने पर तुली हुई है क्योंकि हिन्दू मुस्लिम भाईचारा तो इस सरकार की रीढ़ की हड्डी तोड़ने के समान साबित होगा और उससे उसके वोटरों का ध्रुवीकरण प्रभावित होकर सरकार को ही खत्म कर देगा। मीडिया का भी ज़ाकिर साहब पर अनजाने में होने वाला एक एहसान है कि उसने जिस तरह बंगलादेश की एक घटना को आधार बना कर उनको अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का आतंकवादी प्रचारित करना शुरू किया था उसी से पूरी दुनिया के अमन पसन्द लोग समझ गए थे कि अफ़ज़ल गुरु और याक़ूब मेमन की तरह एक और ज्यूडीशियल मर्डर की योजना बन चुकी है और उस समय डॉक्टर साहब का विदेश में होना भी उनके लिये लाभकारी साबित हुआ वरना देश में रहते हुए तो अब तक वह जेल में डाल दिये गए होते और उनके ख़िलाफ़ अदालत की आवश्यकतानुसार गवाह पैदा करके देश भर के गुण्डे 'ज़ाकिर नाईक को फांसी दो' के नारे लगा कर अदालत को फ़ैसला देने का नैतिक आधार तैयार कर चुके होते। हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की बात करें तो डॉक्टर ज़ाकिर नाईक ग़ैर मुस्लिमों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब उन्ही की धार्मिक पुस्तकों से देने का प्रयत्न करते हैं और फिर इस्लाम से तुलना करते हुए यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि जो बुनियादी बातें उनकी धार्मिक पुस्तकों में कही गई हैं वह क़ुरआन से भिन्न नहीं हैं। चूँकि हर बात वह सन्दर्भ सहित कहते हैं लिहाज़ा उसके नतीजे में ग़ैरमुस्लिमों के बुद्धिजीवी वर्ग में उन सन्दर्भों के अनुसार अपनी और इस्लामी किताबों को पढ़ कर उन बातों को जांचने की उत्सुकता पैदा होती है। इस प्रकार उनमें से जो लोग सत्य को पहचान जाते हैं तो वह अपनी इच्छा से अपना धर्म भी परिवर्तित कर लेते हैं। इस प्रकार हिन्दू समाज के जो लोग अपनी ही धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने का शौक़ नहीं रखते थे वह डॉक्टर ज़ाकिर नाईक के कार्यक्रम को देख और सुन कर उनका इस बात के लिये एहसान मानते हैं कि उनके ज़रीये से वह भी अपने धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के साथ इस्लाम से भी परिचत हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर ज़ाकिर नाईक के ख़िलाफ़ सरकार द्वारा की जाने वाली कार्रवाई बुद्धिजीवी वर्ग के इन हिन्दुओं पर भी ज़ुल्म साबित होगी।
फ़तवा, शहीद और जिहाद की तरह ख़ालिस इस्लामी शब्दावली का लफ़्ज़ है जिसका असल भावार्थ जाने बिना उसके लिये वही भ्रान्तियां पैदा होती हैं जैसी शहीद और जिहाद जैसे पाक लफ़्ज़ों के प्रति पैदा कर दी गई हैं। इसकी वजह है कि इस्लामी शरीयत की सतही सी जानकारी रखने वाले मुसलमान बिना सही मालूमात के इन अल्फ़ाज़ की व्याख्या करने लगते हैं और फिर इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ चल रही साज़िश में शामिल इस्लाम की A B C तक न जानने वाला मीडिया और मुसलमानों के ख़िलाफ़ तरह तरह के मुद्दे पैदा करने में माहिर हिन्दुत्ववादी संगठन मूर्खतापूर्ण टिप्पणियों और तरह तरह के कटाक्ष से माहौल को ऐसा दूषित कर देते हैं कि उसके प्रभाव से कम पढ़े लिखे या शरीयत का इल्म न रखने वाले मुसलमान भी उन्ही की भाषा बोलने लगता है।
अल्लाह ने इंसानों की रहनुमाई के लिये अपने रसूल (स अ व) के ज़रीये क़ुरआन पाक भेजा और उस पर अमल करके दिखाने के साथ ही उसको समझाने की ज़िम्मेदारी भी अल्लाह ने अपने रसूल स अ व को सौंपी जिसके सबूत में रसूल (स अ व) के जीवन का एक एक पल दुनिया के सामने है जो पूरी तरह क़ुरआन के मुताबिक़ है और चूँकि रसूल स अ व के द्वारा बताई हुई हर बात अल्लाह ही की तरफ़ से थी जिसको हदीस कहते हैं और जो अमल उनके द्वारा किये गए, जो सुन्नत कहलाते हैं, भी दीन का भाग हैं।
इसके अलावा रसूल (स अ व) के साथी, जो सहाबा कहलाते हैं, ने अगर सर्व सम्मति से कोई फ़ैसला दिया हो, वह भी मुसलमानों के लिये महत्त्वपूर्ण है और उसके ख़िलाफ़ भी कोई बात कहना जायज़ नहीं है क्योंकि उन लोगों ने रसूल स अ व के जीवन को बारीकी से देखा भी था और वह प्रशिक्षित भी उन्ही के द्वारा किये हुए थे इसके अलावा एक ख़ास बात यह भी थी कि ख़लीफ़ा जैसे इस्लामी शरीयत के सर्वोच्च पद पर आसीन शख़्स भी अगर भूल वश ग़लत फ़ैसला दे देता था तो उसको हर शख़्स टोकने का अधिकार रखता था और उसकी बात सही होने पर ख़लीफ़ा अपना फ़ैसला बदल देता था। इस तरह की बहुत सी मिसालों से इस्लामी इतिहास भरा पड़ा है लेकिन यहां बात समझने के लिये केवल दो उदाहरण काफ़ी हैं।
पहला यह कि हज़रत उसमान र अ जब ख़लीफ़ा बने तो उनके सामने पहला मुक़द्दमा एक ऐसी औरत का आया जिसने विधवा होने पर इद्दत पूरी करने के बाद एक शख़्स से निकाह किया और निकाह के छः माह गुज़रने पर ही उसने एक बच्चे को जन्म दिया लिहाज़ा ऐसी स्थिति में उसका पति उसके ख़िलाफ़ ज़िना का मुक़द्दमा लेकर ख़लीफ़ा के सामने पेश हुआ और ख़लीफ़ा हज़रत उसमान र अ ने उस औरत को अपराधी मानते हुए पत्थर मार कर मौत की सज़ा सुना दी।
इस घटना के बारे में जब हज़रत अली को मालूम हुआ तो वह फ़ौरन हज़रत उसमान (र अ) से मिले और कहा कि आपने यह क्या ग़ज़ब कर दिया वह औरत तो अपराधी है ही नहीं क्योंकि क़ुरआन पाक छः माह में बच्चा पैदा होने की तसदीक़ करता है और उन्होंने क़ुरआन पाक की निम्नलिखित दो आयतों का हवाला दिया जो इस प्रकार हैं-
सूरह अलएहक़ाफ़ की15 वीं आयत में फ़रमाया गया है, अनुवाद:
“हमने इंसान को हिदायत की कि वह अपने माँ बाप के साथ नेक बर्ताव करे। उसकी माँ ने मशक़्क़त उठाकर उसे पेट में रखा और मशक़्क़त उठाकर ही उसको जना और उसके हमल और दूध छुड़ाने में तीस महीने लग गए।”
सूरह लुक़मान की 14 वीं आयत में फ़रमाया गया है, अनुवाद:
“उसकी माँ ने ज़ौफ़ पर ज़ौफ़ उठा कर उसे अपने पेट में रखा और दो साल उसका दूध छूटने में लगे। (इसीलिये हमने उसको नसीहत की कि) मेरा शुक्र कर और अपने वालिदैन का शुक्र बजा ला।”
इस तरह हज़रत अली (र अ) ने दलील पेश की कि उपरोक्त आयतों के अनुसार गर्भवती होने से बच्चा जनने और दूध छुड़ाने तक का समय तीस माह है और दूध छुड़ाने की मुद्दत दो साल है इस तरह तीस माह में से दो साल निकाल दिये जाएं तो छः माह बचते हैं इसके अनुसार वह औरत अपराधी नहीं है। इसके बाद उस औरत को छोड़ दिया गया।
दूसरी मिसाल जंगे सिफ़्फ़ीन के दौरान की है कि जब सीरिया पर हज़रत मआविया का क़ब्ज़ा था और उनकी हज़रत अली र अ से जंग की तैयारी थी ऐसे समय में हज़रत मआविया के पास सन्तान में मीरास के बटवारे का मुक़द्दमा पेश हुआ जिसमें मरने वाले की एक औलाद हिजड़ा थी लेकिन चूँकि क़ुरआन पाक में केवल लड़की और लड़के को मिलने वाले हिस्से का ही ज़िक्र है और नबी (स अ व) के सामने भी ऐसा कोई मामला तय होने के लिये नहीं आया था और हज़रत मआविया भी खुद को फ़ैसला देने में सक्षम नहीं पा रहे थे लिहाज़ा फ़ैसला ग़लत न हो जाए इस डर से उन्होंने इसका जवाब हासिल करने के लिये हज़रत अली (र अ) के पास ख़त भेजा जिसके जवाब में हज़रत अली (र अ) ने फ़रमाया कि उस हिजड़े की पेशाब की जगह देख ली जाए अगर औरतों जैसी हो तो लड़की के बराबर हिस्सा मिलेगा और लड़के जैसी होने पर लड़के के समान हिस्सा मिलेगा।
इन्ही सब की रौशनी में इस्लामी क़ानून बनाए गए और इन्ही को फ़तवा भी कहा जाता है। इसके अलावा अगर कोई नई समस्या आती है तो उसका समाधान मुफ़्ती की डिग्री प्राप्त आलिम से पूछा जाता है जो उपरोक्त तमाम चीज़ों के अध्ययन के बाद फ़तवा देता है।
इस तरह फ़तवा न सुझाव है और न राय है बल्कि किसी शख़्स की समस्या के समाधान के लये एक आलिम द्वारा शरीयत के अनुसार खोजा गया जवाब होता है।
यह जानना भी ज़रूरी है कि जो लोग किसी गुनाह से बचने की नीयत से किसी समस्या का हल प्राप्त करने के लिये मुफ़्ती से फ़तवा लेते हैं वह तो उस फ़तवे को अल्लाह का हुकुम मान कर उस पर अमल करते हैं। इसके अलावा जो लोग केवल खुराफ़ात पैदा करने के लिये फ़तवा मंगाते हैं उनके लिये वह केवल मुफ़्ती की राय होता है।
उदाहरण के लिये: किसी खुराफ़ाती ने फ़तवा मंगवाया कि लड़कियों का मिनी स्कर्ट पहन कर खेलना कैसा है जबकि जाहिल मुसलमान भी यह जानता है कि औरतों और मर्दों के लिये जितना जिस्म ढकना फ़र्ज़ है जिसको सतर कहते हैं, उसका खोलना हराम है लिहाज़ा मुफ़्ती ने लड़की के मिनी स्कर्ट पहनने को हराम बता दिया।
चूँकि यह फ़तवा सानिया मिर्ज़ा को निशाना बना कर मंगवाया गया था और सानिया मिर्ज़ा में इस मामले में अल्लाह का ख़ौफ़ नहीं था इसलिये बजाय यह कहने के कि यह गुनाह है और मैं इस पर शर्मिन्दा हूँ, उसने जवाब दिया कि मौलवी साहब मेरा खेल देखें और मेरी टाँगे न देखें।
इस तरह मीडिया और कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने भी अल्लाह के इस हुकुम का मज़ाक़ बना कर रख दिया और फतवों के ख़िलाफ़ अच्छी ख़ासी जंग छेड़ दी।
इस प्रकार मुसलमानों को चाहिए कि फ़तवे के ख़िलाफ़ चल रही साज़िश का शिकार होने से बचें और ऐसी खुरफ़ातों से दूर रहें……………….।
ईश्वर ने हर चीज़ को नर और मादा के जोड़ों में पैदा किया है तथा दोनों के मिलन से सन्तानोत्पत्ति होती है और नस्ल चलती है। बच्चे चूंकि मादा जनती है इसलिए नर में आकर्षण रखा गया है ताकि मादा द्वारा नर की ओर आकर्षित होने से दोनों का मिलन सम्भव हो सके इसीलिए उसको मादा के मुक़ाबले में ज़्यादा सुन्दर बनाया गया है।
उदाहरण के तौर पर देखें कि मोर मोरनी के मुक़ाबले में अधिक सुन्दर होता है। इसी प्रकार कबूतर कबूतरी से, शेर शेरनी से, नाग नागिन से आदि प्रत्येक जानदार में नर हमेशा मादा के मुक़ाबले में अधिक सुन्दर होता है। इस प्रकार हर जानदार प्राणी की तरह इंसानों पर भी यह बात लागू होना अनिवार्य है। इस तथ्य की रोशनी में यदि विचार किया जाए तो निष्कर्ष यह निकलता है कि पुरुष महिला के मुक़ाबले में अधिक सुन्दर होता है। यह बात इस तथ्य से भी साबित हो जाती है कि हमेशा महिलायें ही सजनें संवरने की ओर ध्यान देती हैं, मर्द नहीं, क्योंकि सुन्दर चीज़ को सजाने संवारने की आवश्यकता ही नहीं है। पुरूषों को रिझाने के लिए सजने, संवरने के अलावा नाचने गाने का कार्य भी महिलाएं ही करती आई हैं ताकि अपनी अदाओं से पुरुषों को आकर्षित कर सकें परन्तु कवियों और शायरों ने महिलाओं की झूठी तारीफें करके उनका दिंमाग आसमान पर पहुंचा दिया है।
इस हक़ीक़त को अगर पुरुष समाज समझ ले तो वह महिलाओं का पीछा करना छोड़ देगा और यदि ऐसा हुआ तो महिलाओं का यौन शोषण भी बन्द हो जायेगा और उनके नख़रे भी ढीले हो जाएंगे और फिर महिलाएं पुरुषों का पीछा करती नज़र आएंगी।
गुजरात में दो मुस्लिम नौजवान भाईयों को आई एस से जुड़े होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। गुजरात ए टी एस के पुलिस महानिरीक्षक के कथनानुसार उनके क़ब्ज़े से कुछ विस्फ़ोटक और जिहादी साहित्य बरामद किये गए हैं। सवाल यह है कि क्या जिहादी लिटरेचर अपने पास रखना अपराध है? जिहादी लिटरेचर पर बात करें तो जिसमें जिहाद, उसका महत्त्व और उससे सम्बन्धित निर्देश दिये गए हों वही जिहादी लिटरेचर कहलाता है। इस सम्बन्ध में यह जानना भी ज़रूरी है कि अपनी सम्पूर्ण शक्ति और सामर्थ्य से किसी काम के करने की कोशिश को जिहाद कहते हैं और यही कोशिश अगर अल्लाह की राह में की जाए तो उसको जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह कहा जाता है जिसको इस्लामी शब्दावली में केवल 'जिहाद' भी कहते हैं। किसी मुसलमान के लिये पवित्र क़ुरआन में दिये गए आदेशों का पालन करना फ़र्ज़ है और उन आदेशों का इंकार करने करने पर वह शख़्स मुसलमान नहीं रहता और चूँकि पवित्र क़ुरआन में जिहाद से सम्बन्धित आदेश मौजूद हैं लिहाज़ा क़ुरआन से बड़ी कोई जिहादी किताब नहीं है। इसके लिये निम्लिखित उदाहरण काफ़ी है जिसमें सच्चे मुसलमान के सम्बन्ध में इस प्रकार फ़रमाया गया है। क़ुरआन पाक की सूरह अलहुजुरात की 15 वीं आयत में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "हक़ीक़त में तो मोमिन वह हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए फिर उन्होंने कोई शक न किया और अपनी जानों और मालों से अल्लाह की राह में जिहाद किया। वही सच्चे लोग हैं।" इस तरह चूँकि कोई मुस्लिम घर ऐसा नहीं है जिसमें क़ुरआन पाक मौजूद न हो और पढ़ा न जाता हो लिहाज़ा उपरोक्त ए टी एस के पुलिस महानिरीक्षक ने जिस धारा के अन्तर्गत दो मुस्लिम युवकों को जिहादी लिटरेचर रखने पर आरोपी बनाया है उस धारा के अनुसार तो हर मुसलमान पर आरोप लगा कर उनको बन्द किया जा सकता है। हक़ीक़त यह है कि यदि जिहादी लिटरेचर देश के लिये हानिकारक होता तो देश आज आज़ाद न होता क्योंकि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना मौहम्मद अली जौहर जैसे हज़ारों मुस्लिम आलिमों ने इसी लिटरेचर से प्रेरणा पाकर आज़ादी की जंग में हिस्सा लिया था और अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ादी दिलवाने को अल्लाह का आदेश मानते हुए और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ की जाने वाली आज़ादी की जंग को जिहाद मान कर अपनी जानों और मालों की क़ुरबानी दी थी। इसी प्रकार का जिहाद करते हुए अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने पहले रुसी फ़ौजों को मार कर भगाया था और अब अमेरिका उनके हाथों ज़लील हो रहा है। जिहाद करने वालों की कामयाबी के मुतअल्लिक़ क़ुरआन पाक की सूरह अलफ़तह की 22 व 23 वीं आयतों में फ़रमाया गया है, अनुवाद, "यह काफ़िर लोग अगर उस वक़्त तुमसे लड़ गए होते तो यक़ीनन पीठ फेर जाते और कोई हामी व मददगार न पाते। यह अल्लाह की सुन्नत है जो पहले से चली आ रही है और तुम अल्लाह की सुन्नत में कोई तबदीली न पाओगे।" इन आयतों में मक्के के काफ़िरों से हुदैबिया नामक स्थान पर जब मदीने से आए हुए मुसलमानों ने जंग के बजाय सुलह कर ली थी तो उस समय का ज़िक्र करते हुए अल्लाह ने फ़रमाया है कि अल्लाह की यह सुन्नत है कि वह अन्त में फ़ी सबीलिल्लाह किये जाने वाले जिहाद करने वालों को ही कामयाबी देता है। इस तरह जिहाद शब्द को बदनाम न करते हुए यह कोशिश होनी चाहिए कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस तरह का माहौल न बनने दिया जाए कि उनको उसके ख़िलाफ़ जिहाद के लिये आमादा होना पड़े क्योंकि अपने इस देश को बचाने के लिये जिस तरह अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जिहाद किया था उसी तरह देश की अखण्डता के लिये मुसलमान किसी भी तरह की क़ुरबानी से में पीछे न रहेंगे।
सोचने समझने की सामर्थ्य रखने वाले इंसानों के ज़ेहन में कुछ सवाल पैदा होते रहे हैं जैसे कि- मैं क्या हूँ? यह दुनिया क्या है? क्या इंसान प्राकृतिक रूप से पैदा हो गया है या उसको किसी ने पैदा किया है? इंसान में जो रूह होती है वह कहां से आती है और मरने के बाद कहां चली जाती है? क्या मरने के बाद इंसान का वजूद ख़त्म हो जाता है या किसी दूसरे रूप में बाक़ी रहता है? अगर इंसानों को पैदा करने वाला कोई है तो वह कौन है और उसका मक़सद क्या है? आदि अनेक सवाल हैं जिनको जानने की जिज्ञासा हमेशा से इंसान के अन्दर रही है, इसी को फ़िलॉसफ़ी या दर्शनशास्त्र और चिन्तन मनन करके इन सवालों के जवाब देने वाले लोगों को फ़िलॉस्फ़र या दार्शनिक कहा जाता है। यह भी सच है कि जितने भी दार्शनिक पैदा हुए हैं उन्होंने दूसरे दार्शनिकों को पढ़ा और चिन्तन मनन करके उनके कुछ विचारों का समर्थन किया और कुछ को नकार कर अपने विचार प्रकट किये और इस प्रकार नए नए नज़रिये लोगों के सामने आते रहे लेकिन अन्तिम और अकाट्य नज़रिया न बन सका। इस बात को किसी शायर ने इन शब्दों में बयान किया है कि- फ़लसफ़े में फ़लसफ़ी को है ख़ुदा मिलता नहीं। डोर को सुलझा रहा है पर सिरा मिलता नहीं। यह भी सत्य है कि किसी भी दार्शनिक ने अपने विचारों को तथ्य या हक़ीक़त न कह कर विचार ही माना है लिहाज़ा सारी फ़िलॉसफ़ी एक बेबुनियाद बात के अलावा कोई महत्त्व नहीं रखती है। यदि हम हक़ीक़त को तलाश करने की कोशिश करें तो उसके लिये केवल एक ही रास्ता है और वह यह है कि इंसान को पैदा करने वाले के सन्देशों को तलाश किया जाए इस विश्वास के साथ कि इंसान जैसे प्रतिभावान प्राणी को बेमक़सद न बनाया गया होगा और उसके लिये अवश्य ही कुछ सन्देश भी भेजे गए होंगे। इस प्रकार तौरैत, इंजील वग़ैरा अनेक किताबें, जो पूरी काएनात को बनाने वाले के द्वारा अपने दूतों या पैग़म्बरों के ज़रीये से भेजी जाने के कारण आसमानी किताबें कहलाती हैं, उनमें इंसान की आवश्यकतानुसार हर तरह के सन्देश मौजूद हैं।इन्ही किताबों का अन्तिम ऐडीशन क़ुरआन है और अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद स अ व हैं। पहले आई हुई किताबें चूँकि असली रूप में मौजूद नहीं हैं और उनका अन्तिम ऐडीशन क़ुरआन के रूप में उपलब्ध है और अन्तिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स अ व के द्वारा कही हुई हर बात का रिकॉर्ड भी मौजूद है जिसको हदीस कहा जाता है। क़ुरआन और हदीस के द्वारा जो आदेश और निर्देश दिये गए हैं वही इस्लाम है। इस प्रकार फ़िलॉसफ़ी कहलाने वाले उपरोक्त सवालों के जवाब जो क़ुरआन और हदीस में हज़रत मुहम्मद स अ व के ज़रिये दिये गए हैं वह किसी फ़िलॉस्फ़र के विचार न होकर हक़ीक़त हैं और यही इस्लामी फ़िलॉसफ़ी है जिसको नज़रअन्दाज़ करके कोई भी फ़िलॉस्फ़र अगर कोई विचार प्रकट करता है तो वह इस्लामी दृष्टिकोण से जहालत है। अन्त में यह बात भी जान लेना ज़रूरी है कि जहालत किसी बात के न जानने को कहते हैं और किसी बात को न जानने वाला उस बात का जाहिल कहलाता है। इस प्रकार हक़ीक़त जानने का ज़रीया उपलब्ध होते हुए उसको नज़रअन्दाज़ करके अपने विचार प्रकट करने वाला जाहिल ही तो होता है।
जब कोई गुण्डा अपनी किसी मांग को पूरा कराने के लिये धमकी देता है कि अगर यह काम न किया तो जान से मार दूंगा तो इसको दण्डनीय अपराध मानते हुए अदालत सज़ा देती है।
मोदी ने नोटबन्दी करके जानबूझ कर देश को हानि पहुंचाने का काम किया और उसके बुरे नतीजे देखते हुए भी उस नादानी वाले फ़ैसले को बदलने के बजाय पचास दिन की समय सीमा इस शर्त पर तय कर दी कि यदि नाकामी हुई तो मुझे सार्वजनिक रूप से फांसी दे दे दी जाए।
उपरोक्त दोनों बातों में जो समानता है उस पर यदि विचार किया जाए तो नतीजे के तौर पर यह बात सामने आती है कि
दोनों मामलों में किसी काम में नाकामी के बदले में नाकाम शख़्स को क़त्ल किया जाना तय किया गया है।
पहले मामले में ऐसी बात तय वाले शख़्स को सज़ा का हक़दार मान कर सज़ा दे दी जाती है जबकि दूसरे मामले में भी नाकामी होने पर क़त्ल किया जाना तय किया गया है चाहे क़त्ल ख़ुद को ही कराया जाना तय किया हो इससे जुर्म की नेचर प्रभावित नहीं होती है क्योंकि क़त्ल किया जाना तय किया गया है चाहे ख़ुद को कराया जाए या किसी दूसरे शख़्स को कराया जाए जुर्म समान है लिहाज़ा दूसरे मामले के मुलज़िम मोदी को क़त्ल की बात तय किये जाने के जुर्म में सज़ा से क्यों बचाया गया है।
यह तो पचास दिन की समय सीमा तय करते समय तक का अपराध है। इस समय तय किये गए पचास दिन पूरे होने जा रहे हैं और उस काम की नाकामी का यह हाल है कि इसकी वजह से हज़ारों लोग मौत के मुंह में चले गए हैं। देश की अर्थ व्यवस्था को जो हानि हुई है वह तो एक न एक दिन पूरी हो जाएगी और देश जितना पिछड़ गया है वह भी आर एस एस के चंगुल से निकलने के बाद उन्नति कर लेगा लेकिन जो लोग एक जुमलेबाज़ की नादानी से नोटबन्दी के कारण असमय मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं वह तो लौट कर आ नहीं सकेंगे। ऐसी स्थिति में इन मौतों का ज़िम्मेदार मोदी के अलावा कोई नहीं है इसलिये यह जानबूझ कर किये गए क़त्ल हैं और क़ातिल की सज़ा फांसी ही बनती है।
ऐसी स्थिति में आशा तो यह की जाती है कि देश का यह अपराधी पचास दिन पूरे होने पर स्वयं फांसी लगा कर मर जाएगा लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो इन सब बातों के परिप्रेक्ष्य में न्यायपालिका से निवेदन है कि वह स्वयं संज्ञान लेते हुए इस पर कार्रवाई करे और दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी में आने वाले इस अपराध में फांसी की सज़ा तय करे।
'साला' शब्द गाली के रूप में क्यों इस्तेमाल किया जाता है? पत्नी जिसको हिन्दू धर्म में अर्धांग्नी कहते हैं और पवित्र क़ुरआन में तो पति पत्नी के रिश्ते को दो शब्दों में ही बड़ी ख़ूबसूरती से बयान कर दिया गया है कि , अनुवाद, "वह तुम्हारी लिबास हैं और तुम उनके लिबास हो" अर्थात् जिस तरह लिबास और जिस्म के बीच में कोई परदा नहीं होता इसी तरह पति पत्नी का सम्बन्ध है और जिस तरह लिबास जिस्म की ज़ीनत होता है उसी तरह पति पत्नी भी एक दूसरे की ज़ीनत होते हैं और जिस तरह लिबास जिस्म के ऐबों को ढकने के साथ उसकी हिफ़ाज़त भी करता है उसी तरह आदर्श पति पत्नी भी एक दूसरे के ऐब ढकने वाले और सुरक्षा करने वाले होते हैं। अंग्रेजी में भी साले अर्थात पत्नी के भाई और बहन के पति के लिये एक ही शब्द 'ब्रोदर-इन-लॉ प्रयोग में लाया जाता है। ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार भी महानतम स्थान पत्नी का ही होता है क्योंकि इसी से इंसान की नस्ल चलती है। साले के रिश्ते की खूबसूरती को 'सारी ख़ुदाई एक तरफ़ और जोरू का भाई एक तरफ़' वाली कहावत चरितार्थ करती है। उर्दू व फ़ारसी में साले के लिए 'बिरादर-ए-निसबती शब्द का प्रयोग किया जाता है। साला चूँकि हिन्दी का शब्द है और हिन्दी में ही इसको गाली भी समझा जाता है लिहाज़ा हिन्दी भाषी समाज ही इसको गाली का रूप देने का ज़िम्मेदार है। इसकी वजह शायद यह है कि इस समाज में पत्नी चूँकि दान के रूप में प्राप्त होने वाली चीज़ होती है इसलिए उससे सम्बंधित रिश्तों को भी सम्मान योग्य नहीं समझा जाता। इसके सबूत में प्रचलित कहावतों को पेश किया जा सकता है जैसे 'साली आधी घरवाली'। क्या इससे ज़्यादा शर्मनाक बात की कल्पना की जा सकती है? ऐसी ही विचारधारा के लोगों ने पत्नी के भाई के लिए प्रयोग किये जाने वाले 'साला' शब्द को गाली के रूप में मान्यता दे रखी है जबकि पति का भाई और पत्नी का भाई बराबर के सम्मान के हक़दार होते हैं। बराबरी के हक़ की मांग करने वाली महिलाऐं भी कभी यह मांग नहीं करती हैं कि जब हम अपने पति के भाईयों को देवर जी और जेठ जी जैसे सम्मान जनक अल्फ़ाज़ से नवाज़ती हैं तो हमारे भाईयों के लिए प्रयोग किये जाने वाले 'साला' शब्द को गाली का रूप क्यों दिया हुआ है?
कल्पना कीजिये कि आपके किसी मित्र की पुत्री किसी बार में काम करती है और लोगों को शराब पेश करती है या किसी की पुत्री किसी होटल में वेटर का काम अंजाम देते हुए खाना परोसती है तो शायद आप ऐसे लोगों को अच्छी नज़र से न देखेंगे और न ही उनकी तारीफ़ करेंगे परन्तु यदि इस तरह के काम से कोई लड़की हवाई जहाज़ के मुसाफ़िरों की सेवा करती है तो एयर होस्टेस के खूबसूरत नाम से जानी जाती है और सभी लोग उसको इज़्ज़त देते हैं जबकि बार या होटल में तो वह केवल पीने खाने की चीज़ें ही परोसती है लेकिन हवाई जहाज़ में मुस्कुरा कर यात्रियों का दिल भी बहलाती है और ज़रूरत पड़ने पर सफ़ाई का काम भी करती है।
इसका कारण सिर्फ़ यह है कि बार या होटल के काम में आपको संस्कृति, संस्कार, हया और शर्म आदि सब कुछ याद रहते हैं और उनके काम ऐब बन जाते हैं लेकिन हवाई परिचारिका के तौर पर किये जाने वाले इन्ही कामों में उनकी खूबियां नज़र आने लगती हैं।
जब किसी अधेड़ उम्र के शख़्स की पत्नी मर जाती है और उसके छोटे बच्चे भी होते हैं तब वह दूसरा विवाह करने के लिए अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से किसी महिला की तलाश के लिए कहता है। जब उससे उसकी पसन्द के बारे में पूछा जाता है तो वह अपनी फ़रमाईश बताते हुए कहता है कि ऐसी विधवा हो जिसके बच्चे न होते हों। इसका सीधा सा अर्थ होता है कि उसको अपने सुख दुःख में साथ देने वाली लाईफ़ पार्टनर के बजाए ऐसी ग़ुलाम चाहिए जो उसके बच्चों की परवरिश के साथ उसकी शारीरिक भूख भी शान्त करती रहे। इसके अलावा अगर कोई ऐसी महिला के सम्बन्ध में बात करता है जो बच्चे वाली विधवा हो तो उससे वह शख़्स इस शर्त पर विवाह करने के लिए तैयार होता है कि बच्चे को वह अपने साथ नहीं रखेगी। ऐसी स्थिति में उस यतीम बच्चे को बाप का साया उठने के बाद माँ की गोद से भी महरूम करके उसकी नानी की परवरिश में दे दिया जाता है। इस तरह एक विधवा होने के दुःख को झेल रही अबला नारी की ममता का भी गला घोंट दिया जाता है। इस तरह किसी दूसरी औरत की मौत के बाद उसके छोड़े हुए बच्चे या बच्चों की एक ऐसी महिला से परवरिश कराई जाती है जिसके बच्चे को उसकी गोद से छीन लिया गया हो। ऐसी सोच रखने वाले लोगों से महिलाओं के अधिकारों की अदायगी की आशा नहीं की जा सकती और समाज को चाहिए कि ऐसी सोच रखने वाले ज़ालिमों की निन्दा करे।
जब कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है तो उसके परिवार और जान पहचान के लोग उसकी मदद के लिए दिन रात एक कर देते हैं और उनकी कोशिशों से अक्सर उससे बड़े भ्रष्ट अधिकारी रिश्वत लेकर उसको छोड़ देते हैं। इसी प्रकार से जब कोई दुकानदार मिलावट करने, कम तोलने या नकली माल बेचने के जुर्म में पकड़ा जाता है तो उसके हिमायती भी उसको बेदाग बचा लेते हैं। इतना ही नहीं चोरी, बलात्कार, धोखा और क़त्ल करने जैसे अपराधियों के समर्थकों की भी कमी नहीं है। इस प्रकार से कुल मिलाकर ऐसे भ्रष्ट और उनके समर्थक तादाद के हिसाब से यदि देखा जाये तो वह बहुमत में हैं। ऐसे ही लोग चुनाव के समय यह कहते हुए देखे जा सकते हैं की अमुक व्यक्ति को वोट देने से अगर वह जीतता है तो वक़्त पर काम आयेगा। 'वक़्त पर काम' आना उनकी भाषा में यह है की जब हमारा कोई आदमी किसी अपराध में पकड़ा जायेगा तो उसको छुड़ाने में मददगार साबित होगा। जो लोग विकास, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा आदि की बेहतरी को चुनाव के लिए पैमाना बनाते हैं वह तादाद में अल्पमत में रहते हैं इसलिए सरकार बनाने के लिए निर्वाचित सदस्यों में गुण्डों, बदमाशों और विभिन्न प्रकार के माफियाओं का बहुमत होता है। यही हमारे देश का दुर्भाग्य है। अच्छे और साफ़ छवि के प्रत्याशी तब तक नहीं चुने जा सकते जबतक की उनको चुनने वाले वोटर भी स्वच्छ विचारधारा के लोग न हो।
इस प्रकार 'यथा राजा तथा प्रजा' की कहावत लोकतन्त्र में बदल कर 'यथा प्रजा तथा राजा' हो जाती है।